Banking

निजी क्षेत्र के बैंक

अभी हाल ही में एक महीने पहले रत्न-सम्राट नीरव मोदी के शोर-शराबे और राष्ट्रीयकृत बैंकों के बढ़ते NPAs के कारण संभावित खतरे की घंटी के मध्य देश के प्राइवेट बैंकों से आशा बंधी थी। सितम्बर ३०, २०१७ तक के आंकड़ों के मुताबिक जहाँ राष्ट्रीयकृत बैंकों का कुल NPAs या डूबत ऋण ७.३४ लाख करोड़ तक पहुंच गया वहीँ प्राइवेट बैंकों के लिए यह आंकड़ा सिर्फ १.०२ लाख करोड़ ही था।

 

जहाँ एक और PSU बैंकों को उनकी अक्षमता, उनमें व्याप्त भ्रष्टाचार और उनके ,स्वायत्तता के अभाव में, राजनैतिक दवाब और क्रोनी कैपिटलिज्म का शिकार होने के लिए घोर आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा था वहीँ कुछ जाने माने प्राइवेट बैंकों की उनके उत्तम व्यापरिक मानकों और परिचालन कार्य कुशलता साथ ही ग्राहकों और अंशधारकों के उनके ऊपर बढ़ते विश्वास के कारण भूरी भूरी प्रशंसा की जा रही थी।

 

प्राइवेट बैंकों के सीईओ हमेशा विभिन्न व्यवसायिक आयोजनों में चर्चा के केंद्र और शिखर पर रहे , दुनिया के अधिपतियों क़ी सूची में अपने नाम दर्ज कराने लगे, उनके उच्च वेतन और बोनस उन्हें संपन्न बनाते रहे । तभी तो जब नीतिकार सरकारी बैंकों के इस मौजूदा संकट के कारण और समाधान के लिए उत्तर खोजने लगे, उनमें से कुछ स्थापित नीतिकार इन सरकारी बैंकों के निजीकरण की वकालत करने लगे।

 

परंतु हाल ही में देश के दूसरे बड़े कुल १०.५ लाख करोड़ वाली परिसंपत्ति वाली निजी आई सी आई सी आई बैंक के संकट ने यह जाहिर किया कि निजी बैंकिंग सेक्टर भी अपने सरकारी सहभागियों की तरह ही चपेट में आ सकते है|  ऐसा समझ में आता है कि इन निजी बैंकों के कॉरपोरेट गवर्नेंस यानि समुचित निगरानी में कहीं न कहीं कमी है|

 

आईसीआईसीआई और एक्सिस जैसे बड़े निजी बैंक और उनके उच्च अधिकारीगण संदेह के घेरे में है और विभिन्न जाँच संस्थाएं छानबीन भी कर रही हैं। आईसीआईसीआई बैंक के मुख्य शख्शियत – दीपक कोचर, एम् डी  और सीईओ चंदा कोचर के पति , दीपक के भाई राजीव कोचर और वीडियोकॉन समूह के चेयरमैन वेणुगोपाल धूत – सबों के लिए सभी एयरपोर्ट्स पर लुक आउट नोटिस जारी किये गए हैं जो मामले की गंभीरता दर्शाते हैं और सनसनीखेज भी बनाते है। चूँकि आईसीआईसीआई बैंक के बोर्ड पर हितों के टकराव और संदिग्ध लेनदेन की स्वतंत्र जाँच के लिए दवाब बढ़ता जा रहा है , कुछ विशेषज्ञ निजीकरण के पैरोकारों का मखौल उड़ा रहे हैं और बकौल उनके सरकारी बैंकों का निजीकरण करना ही बैंकिंग सेक्टर की सभी मुसीबतों या संकट  की कोई राम बाण दवा नहीं है।

 

हमारे देश में २२ बैंक सार्वजनिक क्षेत्र में, ३४ निजी क्षेत्र में और ४४ विदेशी बैंक हैं। हालाँकि कुल ऋण और अन्य दी जाने वाली वित्तीय सुविधाओं में सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी लगभग ६९ प्रतिशत है जबकि निजी क्षेत्र की २७प्रतिशत और विदेशी बैंकों की सिर्फ ४ प्रतिशत।

 

सवाल सिर्फ आईसीआईसीआई बैंक पर ही नहीं उठाया गया है, वरन हाल ही में एक्सिस बैंक द्वारा अपने ऍम डी और सीईओ शिखा शर्मा की लगातार चौथे टर्म के लिए नियुक्ति के निर्णय पर भी इस बैंक के बढ़ते हुए डूबत ऋणों की गंभीर चिन्ताओं के मध्य रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया द्वारा एक्सिस के बोर्ड से पुनर्विचार करने हेतु कड़े शब्दों में कहा है।

 

इसके अलावा पिछले एक साल में नोटबंदी के तुरंत बाद एक्सिस बैंक की कई शाखाओं द्वारा अपने ग्राहकों के पुराने नोट नियम विरुद्ध तरीके से बदलने के गंभीर आरोप लगे। कोबरापोस्ट के स्टिंग ऑपरेशन में भी एक्सिस बैंक के कई अधिकारियों के नाम हवाला और मनी लॉन्ड्रिंग में आये और उनकी लिप्तता स्पष्ट भी हुई। ये सभी बातें भी शिखा शर्मा के खिलाफ, चूँकि उनका कार्यकाल था, जाती है। शर्मा ने २००९ में पद ग्रहण किया था और उनका तीसरा कार्यकाल जून में ख़त्म हुआ। पिछले साल ही उन्हें पुनः तीन साल के चौथे कार्यकाल यानि जून २०२१ तक के लिए कन्फर्म किया गया । हाल के सालों में एक्सिस बैंक का एन पी ए पांच गुना बढ़कर २१२८० करोड़ तक (मार्च २०१७ तक के आंकड़ों के मुताबिक) पहुँच गया और शुद्ध लाभ आधा होकर ३६७९ करोड़ रह गया। इसी अप्रैल ९ को ही दवाब के कारण एक्सिस बैंक ने घोषणा की कि उन्होंने शिखा शर्मा के कार्यकाल को दिसम्बर में ही ख़त्म करने का प्रस्ताव दिया है और तब उनके उत्तराधिकारी का निर्णय किया जायेगा।

 

रिपोर्ट है कि देश के तीन बड़े निजी बैंक – एच एफ डी सी, आईसीआईसीआई और एक्सिस – के बढ़ते NPAs और कॉर्पोरेट गवर्नेंस में कोताही को लेकर उनके सीईओ के बोनस पर ,जो मार्च २०१७ तक के थे , रिज़र्व बैंक ने रोक लगा दी है। आर बी आई की ऑडिट बताती है कि आईसीआईसीआई ने अपने अपने ५६०० करोड़ के डूबत ऋण नहीं बताये या यों कहें छिपा लिए । एच डी एफ सी ने भी इस बावत घालमेल किया और आईसीआईसीआई ने तो कह दिया क़ि वे इस पॉइंट पर जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं है। सितम्बर २०१७ के अंत तक निजी क्षेत्रों के बैंकों में आईसीआईसीआई के नॉन परफार्मिंग एसेट्स सबसे ज्यादा ४४२३७ करोड़ थे और इसके बाद क्रमशः एक्सिस, एच डी एफ सी और जम्मू एंड कश्मीर बैंक आते है।

 

आईसीआईसीआई-वीडियोकॉन घपलेबाजी कॉर्पोरेट जवाबदेही और स्वतंत्र निर्देशकों की, ऑडिटिंग, बोर्ड और मैनेजमेंट की संरचना और प्रक्रिया, वित्तीय पारदर्शिता और सुचना के अधिकार और मालिकाना हक , के प्रति भूमिका पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है। क्या स्वतंत्र निर्देशक इस मामले या क्रियाकलाप को संकट आने के पहले ही नहीं उठा सकते थे ? लाइफ इन्स्योरंस कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया की आईसीआईसीआई बैंक में सबसे बड़ी( १२.३ प्रतिशत) हिस्सेदारी है और इसके चेयरमैन वी के शर्मा बैंक के बोर्ड में हैं। अन्य गैर कार्यकारी निर्देशकों में तुषार शाह, दिलीप चौकसी, अमित अग्रवाल, उदय चताले(स्वतंत्र निर्देशक) और नीलम धवन (एडिशनल एंड इंडिपेंडेंट डायरेक्टर) शामिल हैं। विशेषज्ञ इसे अदभुत मानते हैं क़ि पिछले २ सालों में किसी भी निर्देशक ने कॉर्पोरेट जवाबदेही को लेकर बैंक पर कोई सवाल नहीं उठाया। यदि निर्देशक मण्डल कॉर्पोरेट जवाबदेही में चूक को अनदेखा कर दे, तो मिलीभगत समझ में आती है और मामले को संगीन बनाती है।

 

आईसीआईसीआई बैंक के बोर्ड को शुरुआत में ही चंदा कोचर को बेदाग होने का प्रमाण पत्र देने की क्या जरुरत थी ? अब वे हतप्रभ है और फंस गए हैं। चंदा कोचर को क्लीन चिट देने के पहले बोर्ड को एक स्वतंत्र जाँच करानी चाहिए थी – एक बोर्ड समिति का गठन किया जाना चाहिए था और सभी संदेह के घेरे में आये पदाधिकारियों को तलब करना चाहिए था।

 

फिर बैंकिंग सेक्टर में चाहे सरकारी हो या निजी जो लोग ऊँचे पदों पर आसीन है उनमें व्यक्तिगत नैतिकता तो होनी ही चाहिए। अधिकारियों को जब भी कहीं ईमानदारी और निष्ठा में किंचित भी संदेह हो , उन्हें असहिष्णुता अपनानी चाहिए और अनदेखा नहीं करना चाहिए। आज बेशक कई सरकारी संस्थाये आईसीआईसीआई बैंक के मामले में सार्वजनिक जाँच और छानबीन कर रही है, बैंक ने कोई स्वतंत्र जाँच शुरू नहीं की है। उलटे बैंक ने तो अपने सीईओ का पक्ष लेने में तनिक भी देरी नहीं की और भाई भतीजावाद के सभी आरोपों को सिरे से नकार दिया। ग्लोबल रेटिंग एजेंसी फिच के मुताबिक इस संकट के मामले से  आईसीआईसीआई की प्रतिष्ठा पर आंच आयी है , लोगों के भरोसे में कमी आयी है।

 

स्वतंत्र निर्देशको की भूमिका पर, पहले भी सन २००९ में सत्यम के मामले में जब संस्थापक रामलिंगम राजू ने स्वीकारा था कि ज्यादा लाभ दिखाने के लिए उन्होंने  लेखा जोखा में हेरफेर किया , वाजिब सवाल उठाये गए थे । पिछले साल ही इनफ़ोसिस में भी कॉर्पोरेट जवाबदेही के प्रश्न पर निर्देशक मंडल और संस्थापकों के बीच की खींचातानी देखने को मिली थी। सेबी द्वारा कोटक महेन्द्रा बैंक के चेयरमैन उदय कोटक की अध्यक्षता में कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर गठित कमिटी ने लिस्टेड इकाईयों के स्वतंत्र निर्देशकों की नियुक्ति के लिए कई बदलावों का सुझाव दिया है।

 

इन सुझावों के मुताबिक ६ स्वतंत्र निर्देशकों की नियुक्ति(कम्पनीज एक्ट में कम से कम ३ डायरेक्टर्स का प्रावधान है), उनकी कम से कम आधी कुल बोर्ड मीटिंग्स में उपस्तिथि , नॉन कार्यकारी निर्देशकों की अधिकतम आयु (७५ साल) आदि के प्रावधान है। साथ ही एक निर्देशक अधिकतम ८ मंडल पर ही हो सकता है।

 

परंतु सभी निजी बैंकों को कुछ विवादास्पद मामलों की वजह से संदेह की नजर से देखना कदापि उचित नहीं है। बहुत से निजी और सरकारी बैंकों ने कॉर्पोरेट जवाबदेही के उच्च मापदंड स्थापित किये है , बहुत हद तक हमारा देश साठ गांठ वाले पूंजीवाद( crony capitalism) के चंगुल से निकल चुका है इसीलिए आवश्यक है कि स्वतंत्र निर्देशक निष्ठा और ईमानदारी के ऊँचे मापदंड प्रदर्शित करें जब अनीति के आरोप लग रहे हों।

 

आईसीआईसीआई बैंक का मामला उजागर हुआ अरविन्द गुप्ता , जो बैंक और वीडियोकॉन दोनों के अंशधारक(शेयरहोल्डर) है, के प्रधान मंत्री को २०१६ में लिखे पत्र ,जिसकी प्रतिलिपि रिज़र्व बैंक को भी उन्होंने भेजी, से  इस पत्र में उन्होंने बैंक और वीडियोकॉन के मिलीभगत से किये गए अनैतिक लेनदेन को उजागर किया । इस पत्र के मुताबिक दीपक कोचर ने धूत पर डोरे डालकर उसे अपने ऊर्जा संवंधी स्टार्ट अप न्यू पॉवर रेनेवाबल्स में इन्वेस्ट कराया और चंदा से रिश्तों की वजह से फायदा उठाया। न्यू पॉवर के कई लेनदेन जिनमे वीडियोकॉन के धूत द्वारा किया ६४ करोड़ का निवेश भी शामिल हैं और बाद में सभी शेयरों का अंतिम रूप से दीपक कोच्चर को हस्तांतरण भी है , का जिक्र इस पत्र में था। यह ट्रांसफर धूत ने आईसीआईसीआई बैंक से वीडियोकॉन को ३२५० करोड़ का ऋण मिलने के ६ माह बाद किया । उनका यही कृत्य ही विभिन्न जाँच संस्थाओं के राडार पर है। इसके अलावा राजीव कोचर की फर्म अविस्ता एडवाइजरी ग्रुप द्वारा आईसीआईसीआई के ग्राहकों को राय देने के लिए किये गए व्यवसायिक लेनदेन भी, जो स्पष्टतया हितों के टकराव को दर्शाते हैं , संदेह के घेरे में हैं और उनकी भी जाँच हो रही है।

 

दीपक कोचर का तर्क है कि उनकी पत्नी को उनके वीडियोकॉन से व्यापारिक रिश्तों की कोई जानकारी नहीं थी और राजीव कोचर के संबंध में बैंक बचाव करती है कि चूँकि चंदा कोचर का उनसे देवर का रिश्ता कम्पनीज एक्ट के मुताबिक सीईओ के रिश्ते की परिभाषा में नहीं आता, बैंक के लिए राजीव के व्यवसायिक हितों का खुलासा करना आवश्यक नहीं है। क्या एक प्रतिष्ठित बैंक के ग्राहकों, निवेशकों और अंशधारियों को इसके उच्च अधकारियों से पारदर्शिता और विश्वसनीयता की उम्मीद नहीं करनी चाहिए ? क्या बैंक को यह नहीं समझना चाहिए क़ि इनके निर्देशकों और सभी अधिकारियों को रिश्तेदारों के हितों को बैंक के हितों से बिलकुल अलग रखना चाहिए ?और फिर जितना आप ऊपर चढ़ते हो, आपको अपने नाते रिश्तेदारों से दूरी बनाए रखनी चाहिए और यह स्वयं ही स्फुरित होना चाहिये, किसी नियम कायदे से ऊपर।रॉयल बैंक ऑफ़ स्कॉटलैंड की भारत की सीईओ सह चेयरमैन मीरा सान्याल के मुताबिक जाँच संस्थाओं के निर्णय के पहले ही किसी भी तरह की अवधारणा से बचना चाहिये। हितों के टकराव के जो आरोप आईसीआईसीआई बैंक के मामले में हैं, निश्चित ही संगीन है।  आशा तो यही है कि चंदा कोचर ने अपने इन संबंधों का अवश्य ही खुलासा किया होगा जिसकी एक सीईओ या उच्च अधिकारी से उच्च गवर्नेंस के मानकों के तहत उम्मीद भी है।

 

धूत दिलीप कोचर के साथ अपने व्यापारिक नाते में किसी भी तरह के छल कपट से इंकार करते है। वे न्यू पावर में किसी भी निवेश से इंकार करते है। धूत कहते है कि ने पावर नाम की कंपनी सिर्फ १ लाख की शेयर कैपिटल से बनी थी जब उन्होंने और कोचर ने साथ साथ इस कंपनी में जाने का निश्चय किया और इसके बाद इस कंपनी के साथ उनके कोई वित्तीय लेनदेन नहीं रहे। आईसीआईसीआई बैंक ने चंदा कोचर में पूरा विश्वास जताया है और किसी भी तरह की अनियामितिता, मिलीभगत और हितों के टकराव के मामले के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। बैंक ने सम्बंधित सभी संस्थाओं को बाकायदा सूचित किया है कि निर्देशक मंडल की आगामी ७ मई को मीटिंग होगी और उसमें वित्तीय वर्ष २०१७-१८ के ऑडिटेड रिपॉर्ट और एकाउंट्स पर विचार विमर्श होगा।

 

रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया की एक नियंत्रक की भूमिका  में लापरवाही को नकारा नहीं जा सकता । सवाल वाजिब है कि रिज़र्व बैंक ने व्हिस्टीलब्लोव्रर गुप्ता के पत्र पर २ साल तक चुप्पी क्यों साधे रखी ? कम से कम रिज़र्व बैंक आईसीआईसीआई बैंक को एक बोर्ड की समिति गठित कर स्वतंत्र जाँच का आदेश तो दे सकती थी। जहांतक तुलनात्मक बात की जाय तो निजी और विदेशी बैंकों पर नियंत्रण के लिए रिज़र्व बैंक के पास सरकारी बैंकों के बनिस्पत ज्यादा अधिकार है। संक्षेप में रिज़र्व बैंक को क्रोनी कैपिटलिज्म के दवाब और राजनैतिक हस्तक्षेप की परवाह न करते हुए भारतीय बैंकिंग सिस्टम की विश्वसनीयता लौटाने के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी होगी।

 

यह एक अलग बात होगी कि आईसीआईसीआई बैंक तकनीकी आधार पर किसी तरह की अनियमितता या कुछ भी गलत होने से इंकार करें और हो सकता है अपने इस आधार के बल पर खुद को पाकसाफ भी साबित कर लेवे|  फिर भी नैतिकता का तकाजा है पारदर्शिता जिसकी मांग है क़ि सभी फैक्ट्स पूरी तरह से सार्वजनिक तौर पर रखे जाएं। चंदा कोचर ने क्यों नहीं अपने पति के वीडियोकॉन के साथ व्यवसायिक रिश्तों की बात क्रेडिट कमिटी के सामने रखी जो धूत के ऋण के मामले को देख रही थी ? क्या आईसीआईसीआई बैंक के बोर्ड को राजीव कोचर के व्यवसायिक हितों की जानकारी नहीं थी  और थी तो क्यों आंखें मूंद ली ? क्या बोर्ड को भावी खतरे का बिलकुल भी आभास नहीं था खासकर तब जब वीडियोकॉन को दिए गए ऋण का लगभग ८६ प्रतिशत यानि २८१० करोड़ २०१७ में NPA होने की घोषणा कर दी गयी ?

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