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आधार प्रोजेक्ट – सही विश्लेषण ।

निजता हमारा मौलिक अधिकार है( fundamental right to privacy)- कितना मायने रखता है जब हम प्रायः रोज ही अपनी निजता किसी न किसी से किसी न किसी रूप में  साझा कर रहे है ? किस सुरक्षा की हम बात कर रहे हैं ? जब हर कोई अपनी निजी जानकारियां साझा कर रहा है यहाँ तक कि राज्य या देश के साथ भी किसी न किसी उदेश्य से, तो क्या इस बात की छूट मिल गयी है या यह अधिकार संविधान से पृथक कर दिया गया है और साझा की गयी जानकारी पर उनका कोई नियंत्रण नहीं रह गया है।

निजता(privacy) का मतलब जरुरी नहीं कि तन्हाई या अकेलापन है। निजी जानकारियां या विचारों को साझा करना आज दिनचर्या बन गयी है। यह बिलकुल व्यक्तिगत मामला है क़ि हम क्या किससे किन परिस्थितियों या किन उदेश्यों के लिए साझा करते है और तबतक यह वैध भी है। किसी रूप में इसे छूट नहीं माना जा सकता क़ि क्या  हम साझा करना चाहते है और कब हम इसे रोकना चाहते हैं । यही हमारा विवेक है या कहें क़ि सही मायने में निजता का अधिकार है।

हमारी निजता का अधिकार(right to privacy) हमें व्यक्तिगत गौरव और स्वायत्ता का अधिकार देता है – निजी जानकारियां, स्पीच , विचारों और कार्य के नियंत्रण की पूरी आज़ादी देता है । इनमें हमारी वयक्तिगत रुचियां जैसे कि हम क्या खरीदते है और अन्य पर्सनल पहलू जैसे कि हमारी राजनैतिक सोच, हमारा लैंगिक रुझान आदि भी शामिल है। इस तरह निजता के अधिकार का मूलभूत तत्व  हमारी स्वाधीनता या स्वतंत्रता और हमारा आत्मनिर्णय है।

निजता पर चर्चाओं के लिए सहमति होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। चूंकि विचारों क़ी विषमता, धन या बाहुबल से मरजी या सहमति प्रोत्साहित या हतोत्साहित या प्रभावित हो सकती है , मामला बड़ा ही पेचीदा है। इसीलिए तर्क दिया जाता है क़ि ऐसी स्तिथियाँ निर्मित हों  कि सहमति या असहमति स्वतंत्र हो, सही हो, सूचित हो, मुखर हो और अर्थपूर्ण हो।

सहमति स्वेक्षापूर्वक मर्जी से दी गयी है – यह तभी जाना जा सकता है यदि सहमति नहीं दी जाती तो सम्बंधित मनुष्य को व्यक्तिगत क्षति होती। सहमति(consent) स्वतंत्र और अर्थपूर्ण है – सनिश्चित करना राज्य की संवैधानिक जिम्मेवारी है।

सभी निजता के हनन के मामले एक ही सीमा या हद में नहीं आ सकते। किसी व्यक्ति को बंदी बनाना या उसपर निगरानी रखना निजता का घोर हनन है वहीँ लोगों के दरम्यान बातचीत को छुप कर सुन लेने से शायद उन लोगों का कोई विशेष नुकसान न हो। इसीलिए निजता हनन के प्रकार समझना आवश्यक है। एक होता है “privacy takings” यानि निजता मांगकर लेना और दूसरा होता है “privacy intrusions” यानि किसी की निजता का बिना आज्ञा के अतिक्रमण करना। “प्राइवेसी टेकिंग्स” का सिद्धांत अमेरिका में विकसित हुआ जहाँ इसके नाम पर सरकार और निजी संस्थाओं ने लोगों की प्राइवेसी में सेंध लगायी।

प्राइवेसी टेकिंग्स  न केवल एक व्यक्ति की निर्णय-क्षमता को काफी हद तक कुंठित करता है बल्कि उसे संप्रभुता से पूर्णतया वंचित भी कर देता है। इसके विपरीत “प्राइवेसी इंट्रूशन्स” का तात्पर्य समयबद्ध उल्लंघन से है जहाँ निर्णय-क्षमता की निजता एक निश्चित समय के बाद भरसक वापस मिल जाती है ।

दोनों प्रकार से सरकारों और निजी संस्थाओं द्वारा निजता यानि प्राइवेसी का हनन हो रहा है। क्या यह हनन संवैधानिक दायरे में हो रहा है ? निजता का अधिकार पूर्णतया नहीं है चूँकि कोई भी मौलिक अधिकार निरंकुश नहीं है और कर्तव्य से भी बंधे हैं। जबकि यह तय है क़ि प्राइवेसी टेकिंग्स   से गंभीर व्यक्तिगत क्षति अवश्यम्भावी है, उच्चस्तरीय न्यायिक समीक्षा की जरुरत से नकारा नहीं जा सकता। सरकार से अपेक्षित है क़ि न केवल वे अपने इस कदम के विधिसम्मत भाव को रखें बल्कि यह भी सिद्ध करे क़ि उनके इस निर्णय से नागरिक स्वतंत्रता का न्यूनतम ह्वास् होगा। जहाँ तक प्राइवेसी इंट्रूशन्स की केटेगरी के हनन का सवाल है , अपेक्षाकृत कम न्यायिक समीक्षा की जरुरत है। हालांकि प्रथम तो न्यायालय को यह तय करना है क़ि सरकार या किसी निजी संसथान द्वारा निजता हनन का कृत्य जो संदेह के घेरे में है वह प्राइवेसी लेने की श्रेणी में है या प्राइवेसी को भेदने की श्रेणी में है।

प्राइवेसी लिए जाने से जो चरम व्यक्तिगत क्षति हो रही है, निजी संस्थाओं द्वारा किये जा रहे प्राइवेसी टेकिंग्स के कृत्यों पर पूर्णतया रोक लगनी चाहिए। यहाँ तक क़ि जहाँ औपचारिक सहमति की भी बात की जा रही है, सरकार को हस्तक्षेप कर इस तरह की सहमति लिए जाने पर भी रोक लगानी चाहिए जैसा  आत्म हत्या या बंधुआ दासता के प्रकरण में होता है।

आधार सिस्टम को तर्कसंगत और न्यायोचित तभी तक माना जा सकता है जब हितग्राहियों या जरूरतमंदों ने घोषित सामाजिक लाभों के लिए निजता यानि प्राइवेसी को आधार के माध्यम से भेदने की सहमति दी हो।

आज आधार नंबर लेना और उसे लिंक कराना इनकम टैक्स रिटर्न्स से, बैंक अकाउंट से, ड्राइविंग लाइसेंस लेने के लिए, फ़ोन कनेक्शन के लिए, मोबाइल फ़ोन से , स्कूल में दाखिले के लिए तथा और भी अन्य चीजों से ,अनिवार्य किया गया है , इस हालात में अपने व्यक्तिगत नुकसान का जोखिम उठाकर ही कोई बिना आधार कार्ड की सोच सकता है। तात्पर्य है क़ि व्यक्ति बहुत सी या यों कहें क़ि लगभग सभी सामाजिक सुविधाओं से वंचित कर दिया जायेगा यदि उसने आधार कार्ड नहीं बनवाया और विभिन्न जगहों पर लिंक  नहीं कराया। सहमति या असहमति तो मात्र एक औपचारिकता ही समझ में आती है। और फिर जिस तरह विभिन्न लोक सेवाएं और निजी संस्थाओं द्वारा आधार डिटेल्स लिए जा रहे हैं, उससे ज्यादा से ज्यादा उपभोता प्रोफाइल्स तैयार होंगे जिनका दुरूपयोग नहीं होगा इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता।

यूजर प्रोफाइल्स के आधार पर संभावित उपभोक्ताओं को चिन्हित कर विज्ञापन चालू हो चुके है और उसे सौम्यता की संज्ञा दी जा रही है – तो शुरुआत हो चुकी है। लेकिन बेसुमार सोशल साइट्स और टूल्स पूरी तरह से इन उपभोक्ताओं के प्रोफाइल्स का गंभीर और बेजा दुरूपयोग करने में सक्षम है। उदाहरणार्थ, उपभोक्ताओं के प्रोफाइल्स के माध्यम से उनकी पहचान को गुपचुप तरीके से जोड़कर उन्हें कई तरह की नागरिक स्वतंत्रताओ जैसे कि भविष्य की नीतियां , ऑनलाइन अभिव्यक्ति की आज़ादी आदि  से वंचित किया जा सकता है , सामाजिक भेदभाव भी परिलक्षित हो सकता है। इस तरह के मूक जुड़ाव से प्रभावित व्यक्ति के पास विरोध का अवसर भी नहीं होगा।

आधार प्रोजेक्ट का जो अनंत विस्तार हो रहा है , निजता हनन (privacy takings) का कुत्सित प्रयास है।

डॉ राधाकृष्णन की पंक्तियां याद आती है जो शायद यह भाव प्रकट करती है कि हमे मानवीय मूल्यों की स्वतंत्रता पर कुठाराघात करने की राज्य की हर कोशिश का पुरजोर विरोध करते हुए  उन्हें हर हाल में बचाना चाहिए। हालाँकि आर्थिक सुधारों के लिए राज्य अधिनियम बनाते है जो जरुरी भी है पर ऐसा मानवीय मूल्यों की तिलांजलि देकर नहीं किया जाना चाहिए। निजता के अधिकार का लक्ष्य इन्ही मानवीय मूल्यों की सुरक्षा और पोषण  होना चाहिए। अभीतक तो न्यायप्रणाली ने इस अधिकार को पूर्ण वैधानिक मान्यता दी है और अपेक्षा की जाती है क़ि निजता के दावों को इस तरह वर्गीकृत किया जाय क़ि प्राइवेसी को एक ऐसे मूल अधिकार का दर्ज़ा मिले जो नागरिकों की स्वतंत्रता कायम रखे न क़ि सीमित करें।

जरुरत है एक सकारात्मक मुहीम की जो राज्य की आधार को लेकर जो नीति है उसमें बदलाव करें। क्या ही अच्छा हो क़ि इसी ज्वलंत मुद्दे पर हमारे देश में भी जनमत संग्रह की शुरुआत हो जाय।

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