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बैंक घोटाले

बैंक घोटाले: नीति, नीयत के साथ-साथ निगरानी पर सवाल

बैंक और घोटाला एक दूसरे के पर्याय बनते नजर आ रहे हैं। लगातार उजागर होते बैंक घोटालों की लंबी फेहरिस्त यह बयान कर रही है कि देश की बैंकिंग व्यवस्था में नीतिगत और क्रियान्वयन स्तर पर बड़ी खामियां व्याप्त हैं। बैंक से ऋण आदि सेवाओं की अपेक्षा करते ही दस्तावेजीकरण के जिन्न का सामने प्रकट होना सामान्य बात है। घर, कार या कारोबार हेतु ऋण लेने जाएं तो बैंकों के अनेक चक्कर काटने पड़ते हैं। तमाम तरह के अभिलेखों की फरमाइश की जाती है। अथक प्रयासों के बाद कहीं जाकर ऋण मिलता है। अगर ऋण की एक किश्त भी जमा करने में विलंब हो जाए तो बैंक वाले फोन करने लगते हैं। अनेक बार तो बैंक से उपभोक्ता को मिल रही धमकी विषयक खबरें अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। कोर्ट तक को हस्तक्षेप करना पड़ता है।

लिहाजा आज आम आदमी यह सवाल पूछ रहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से बड़े-बड़े कारोबारियों को महज दो-तीन दिन में 280 करोड़ का लोन कैसे मिल जाता है? पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) और रोटोमैक के बाद देश की सबसे बड़ी चीनी मिलों में से एक हापुड़ की सिम्भाऔली शुगर्स लिमिटेड और उसके अधिकारियों के खिलाफ करीब 110 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का मकदमा दर्ज होने के बाद, यह सवाल और सरबुलंद हो गया है। हालत यह है कि राष्ट्रीयकृत बैंकों के निजीकरण के सुझाव अनेक वित्त विशेषज्ञों द्वारा दिये जा रहे हैं।

आखिर क्या कारण है कि आरबीआई, वित्त मंत्रालय, सीवीसी और अन्य लोग घोटाला होने के बाद ही क्यों जागते हैं? हम सिस्टम की विफलता का विश्लेषण क्यों नहीं कर रहे हैं? सरकार और इसकी नीतियों की भूमिका क्या है जो सिस्टम विफलताओं और घोटालों का कारण बनती है? हर्षद मेहता घोटाला, केतन पारेख घोटाला और इस प्रणाली में दुरुपयोग और कमियां होने के कारण एनपीए घोटाले हुए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार एनपीए में बड़े उद्योगों का हिस्सा करीब 70 फीसदी है। उन्होंने कहना है कि बैंक तो आम आदमी को दिए लोन की आमदनी से चल रहे हैं। उद्योगों को 4 से 6 फीसदी की दर पर लोन मिलता है और आम आदमी को 8 से 15 प्रतिशत तक की दर पर।

उद्योगों को दिए 100 रुपए के कर्जे में 19 रुपए डूब रहे हैं तो आम आदमी के महज 2 रुपए। वो भी बाद में वसूल हो जाते हैं। मतलब बैंक व्यवस्था चलाने में योगदान आम जनता दे रही है। लेकिन बैंक हजारों करोड़ का कर्ज उद्योगपतियों को दे रहे हैं। उद्योगपति वो कर्जे लेकर आराम से विदेश भाग रहे हैं लेकिन बैंक से लेकर सरकार तक कुछ नहीं कर पा रही है। क्यों नहीं सरकार बैंक ऋण बकाएदारों के नामों को प्रकाशित करे और बैंकों को इन कंपनियों के निदेशकों के पासपोर्ट में प्रवेश करने के लिए गृह मंत्री को लिखने का निर्देश दे ताकि वे देश से भाग न सकें।

सवाल उठता है कि यह मामले आडिटर की पकड़ में क्यों नहीं आये या उसने इसे नजरअंदाज किया? दोनों स्थितियों में उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए, क्योंकि उसकी आडिट पर ही सबकुछ निर्भर है। जिस दिन आडिटर की जवाबदेही तय हो जाएगी, और उन पर अपराधिक मुकदमें दर्ज होने लगेंगे, इस देश में घोटाले बंद हो जाएंगे। बोर्ड में आरबीआइ व सरकार के प्रतिनिधि भी जाते हैं, इसलिए इस मामले में राजनीतिक हस्तक्षेप से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। क्या बैंको में हस्तांतरण नियमों का कड़ाई से पालन किया जा रहा है? बैंक अधिकारी को हर दो या तीन साल में स्थानांतरित किया जाना आम बात होती है। विदित हो कि पीएनबी घोटाले में शामिल विशेष कर्मचारी के मामले में, स्थानांतरण नीति का उल्लंघन किया गया था। कर्मचारी सात वर्षों तक अपने पद पर बने रहे, जिसके दौरान वह नीरव मोदी की कंपनियों को ऋण प्रदान करने के लिए लेन-देन का प्रबंधन कर रहे थे। अगर हस्तांतरण नियमों का पालन किया गया होता, तो इस तरह का घोटाला नहीं होता या काफी पहले ही पकड़ा जा चुका होता। अनेक विशेषज्ञों का कहना है कि देश की सार्वजनिक बैंकिंग प्रणाली में लेखता देयता और मानकों की कमी के कारण ऐसे घोटालों की घटनाएं हो रही हैं। बैंक घोटाले, कानूनों और विनियमों का उल्लंघन का एक रूप हैं। इन उल्लंघनों में कुछ कर्मचरियों का हाथ होता है, जिनके बारे में शीर्ष प्रबंधन को जानकारी नहीं होती है। किसी बैंकिंग फर्जीवाड़े में बैंक के कुछ कर्मचारियों या बाहरी लोगों या इन दोनों की मिलीभगत के कारण बैंक को नुकसान उठाना पड़ता है। अक्सर (हमेशा नहीं), फर्जीवाड़े का संबंध कर्जे या जोखिमग्रस्त साख की मंजूरी से होता है। दूसरे उदाहरण भी हैं जब खुद बैंक ही कानूनों और विनियमों को तोड़ते हैं, जिसका खामियाजा ग्राहकों, अंशधारकों और कभी-कभी करदाताओं को भी भुगतना पड़ता है। यह शीर्ष प्रबंधन की जानकारी में होता है। दीगर है कि बैंकिंग घोटालों का संबंध सिर्फ कर्जे से नहीं है।

इनका संबंध  ऑपरेशनल रिस्क से भी हो सकता है, जिसमें कर्मचारियों या बाहरी लोगों द्वारा व्यवस्थाओं या कार्य-प्रणालियों को नष्ट किया जाना शामिल होता है। उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति बैंक की आईटी प्रणाली को हैक कर ले और ग्राहक के खाते से फंड हस्तांतरित कर दे, तो बैंकों को उस नुकसान की भरपाई करनी पड़ेगी। खैर एक बात तो स्पष्ट है कि सरकार हमेशा चाहती है कि जो लोग कारोबार करते हैं, उन्हें पैसे की दिक्कत न हो। कारोबार बढ़ेगा तो लोगों को रोजगार मिलेगा। अगर धन की दिक्कत होगी तो व्यवसाय ठप हो जाएगा और इससे हजारों लोग बेरोजगार हो जाएंगे। इसलिए सरकार कारोबारियों की मदद करती है ताकि व्यवसाय सुचारू रूप से चलता रहे। कोई भी ऋण प्रक्रिया तीन चरणों से गुजरती है।एक मेकर होता है जो ऋण को प्रासेस करता है, दूसरा चेकर होता है जो उसे चेक करता है और एक सीमा के बाद उसके स्वीकृति की जरूरत पड़ती है। तीन चरणों से गुजरने के बाद भी यह गड़बड़ी कैसे हो गई? निश्चित तौर पर इसमें नीचे से लेकर ऊपर तक के अधिकारियों का गठजोड़ है। कहावत है कि जब बाड़ ही खेत को खाने लगे और मांझी नाव को डुबोने लगे तो फिर इसे कौन बचाएगा।

मजबूत आरबीआई की दरकार

मतलब समस्या स्वामित्व की नहीं बल्कि निगरानी की है। आरबीआई का स्पष्ट निर्देश है कि जिसे ऋण दिया जा रहा है, उसका ट्रैक रिकार्ड अच्छा हो लेकिन आरबीआई ने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह भी देख लिया जाए कि उसे पूर्व में जारी एलओयू का भुगतान हो चुका है या नहीं अथवा उसे तभी एलओयू जारी किया जाए जब उसने पूर्व में जारी एलओयू का भुगतान कर दिया हो। यहां बैंकों को स्व विवेक पर छोड़ दिया। चूंकि स्व विवेक का उपयोग लोग अपने लाभ के लिए करते हैं, बैंकों ने भी वही किया। एलओयू जारी करने पर उसका 0.2 या 0.25 % कमीशन बैंक को मिलता है। बैंकों की गलाकाट प्रतिस्पर्धा के बीच में पीएनबी इसका लोभ छोड़ नहीं पाया और नियमों को दरकिनार कर एलओयू जारी कर दिए गए।

शायद यहीं पर मजबूत आरबीआई की दरकार दरपेश होती है। सामान्य व्यवहार यही है कि बैंक रिजर्व बैंक को फर्जीवाड़ों की जानकारी देते हैं, जिसके बाद रिजर्व बैंक हरकत में आता है। अगर आरबीआई ने निगरानी का काम सही अंदाज में किया होता तो ये गुनाह हो न पाते अथवा समय रहते प्रकाश में आ जाते। अब सवाल है कि एक बढिय़ा प्रदर्शन वाला आरबीआई कैसे हासिल किया जाए? सबसे पहले तो आरबीआई को मजबूत कोष और मजबूत बैंकिंग की कोशिश करनी चाहिए। मुद्रास्फीति को लक्ष्य बनाने के साथ इनमें से एक दिशा में काम आरंभ हो चुका है जबकि दूसरे पर होना है। इसके अलावा भी अन्य लक्ष्य हैं जिन पर हम विफल रहे हैं। बोर्ड की भूमिका भी इसमें अहम है।

आरबीआई बोर्ड को को सामान्य बैठकों की परिपाटी से निकलते हुये संगठन के डिजाइन, संसाधन आवंटन और प्रक्रिया आदि पर जोर देना चाहिये और विभागीय प्रमुखों को उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए। जिससे संगठन इनकी अनदेखी नहीं कर पायेगा। यही नहीं बोर्ड द्वारा विधायी, कार्यपालिक और न्यायिक कदमों के लिए विस्तृत प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए। वर्तमान में यह कार्य आरबीआई स्टाफ कर रहा है जिससे एक तरह का मनमानापन दिखाई पड़ रहा है। जरूरत इस बात की है विस्तृत प्रक्रियागत कानून बनाया जाए ताकि निष्पक्ष तरीके से और सक्षम ढंग से कामकाज हो सके। ध्यातव्य है कि अगर बैंकिंग नियामक में एक विशिष्ट स्तर की क्षमताएं नहीं होंगी तो हमारी बैंकिंग यूं ही दिक्कतों से दो-चार होती रहेगी।

हमें एक व्यापक बैंकिंग व्यवस्था को चुनौती के रूप में देखना होगा। वरिष्ठ पत्रकार भास्कर दूबे कहते हैं कि सड़क हादसों और विमान दुर्घटनाओं की तरह बैंक फर्जीवाड़ों को टाला नहीं जा सकता है। कहा जा सकता है कि इन कारोबारों को करते वक्त यह कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए। ऐसे में जीवित बचे रहने के लिए जरूरी है कि फर्जीवाड़े के कारण होने वाले नुकसान को कम से कम रखा जाए। पश्चिमी देशों में बैंकिंग प्रणाली भी घोटालों की चपेट में है, लेकिन कठोर प्रक्रिया और नियमों का पालन सुनिश्चित करता है कि बड़े घोटालों से बचा सके।

2008 के सब प्राइम ऋण संकट के बाद, जिसने दुनिया की अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया, अंतर्राष्ट्रीय बैंकों ने पर्यवेक्षण और कॉर्पोरेट प्रशासन को और मजबूत किया है। दुर्भाग्य से, इस क्षेत्र में भारतीय बैंक पीछे रहे हैं। जब तक कि, मजबूत उपाय नहीं किए जाते हैं, प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित नहीं किया जाता है और बैंकों को अधिक जवाबदेह नहीं बनाया जाता है, तब तक ऐसे घोटाले नियमित अंतराल पर होते रहेंगे।

निजीकरण नहीं है समाधान

पीएनबी घोटाले के बाद राष्ट्रीयकृत बैंकों के निजीकरण के सुझाव अनेक वित्त विशेषज्ञों द्वारा दिये जा रहे हैं। लेकिन क्या यह समाधान है? क्योंकि आंकड़ों पर गौर करें तो 2007 से 2017 तक राष्ट्रीयकृत बैंकों के एनपीए में लगभग 311 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसकी तुलना में प्राइवेट बैंकों का एनपीए भी लगभग 270 प्रतिशत बढ़ा है। दोनों बैंक तो साथ-साथ चल रहे हैं। 1995, 2005 व 2008 में प्राइवेट बैंक भी डूबे, तो फिर उन पर भरोसा कैसे कर सकते हैं। एक्सिस बैंक का भी तो पैसा गया है। तो फिर निजीकरण समाधान कैसे हो सकता है?

बैंकों का निजीकरण नहीं बल्कि स्पष्ट नियम और नियमों का कड़ाई से पालन जरूरी है। बैंकों में अब तक कुल मिलाकर लगभग सात लाख करोड़ रुपये का घोटाला हो चुका है। ये घोटाले कई बार में हुए। हर बार जांच बैठाई गई, कुछ रिकवरी भी हुई लेकिन दोषी दंडित नहीं हुए। यदि दोषियों को चिह्नित कर कड़ी कार्रवाई की गई होती और नीचे से लेकर ऊपर तक के संबंधित अधिकारियों को दंडित किया गया होता तो पुन: उसी काल व परिस्थिति में घोटाले नहीं होते। बैंकों में पुन: घोटाले न हों, इसके लिए प्रत्येक चरण पर हर व्यक्ति की जिम्मेदारी व जवाबदेही स्पष्ट रूप से तय कर देनी चाहिए।

 

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