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धंधा पानी: डॉलर के आगे रुपया बेहाल, आप पर ये होगा असर

अमरीकी डॉलर के मुक़ाबले रुपया 15 महीने के निचले स्तर पर पहुँच गया है. जानकारों की मानें तो रुपये की चाल अभी जल्द तो संभलने वाली है नहीं. अवमूल्यन का मतलब है कि पेट्रोल और खाने पीने की चीज़ें महंगी हो सकती हैं.

अमरीकी डॉलर को वैश्विक करेंसी का रूतबा हासिल है. इसका मतलब है कि निर्यात की जाने वाली ज्यादातर चीजों का मूल्य डॉलर में चुकाया जाता है. यही वजह है कि डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत से पता चलता है कि भारतीय मुद्रा मजबूत है या कमजोर.

अगर रुपया इसी तरह गिरता रहा तो कच्चे तेल का इंपोर्ट हो सकता है महंगा, तो बढ़ सकती है महंगाई- मतलब सब्जियां महंगी होंगी, खाने-पीने की चीजें महंगी होंगी. साथ ही डॉलर में होने वाला पेमेंट पड़ेगा भारी, विदेश घूमना महंगा होगा, विदेशों में बच्चों की पढ़ाई महंगी हो सकती है.

डॉलर के मुक़ाबले रुपये में कमज़ोरी जारी

-पिछले एक महीने में सवा दो रुपये से अधिक टूटा रुपया

-रुपया १५ महीने के सबसे निचले स्तर पर

-कच्चे तेल में उबाल ने बिगाड़ी रुपये की चाल

उपरोक्त सुर्खिया रोज सुनने मे आती है और बरबस ही पूर्व मे बीजेपी के इन सदाबहार और नामाचीन नेताओ कॆ बयान याद आते है –

गस्त २०१३, जगह- लोकसभा, नेता- सुषमा स्वराज

“इस करेंसी के साथ देश की प्रतिष्ठा जुड़ी होती है और जैसे-जैसे करेंसी गिरती है, तैसे-तैसे देश की प्रतिष्ठा गिरती है…..”

तब लोकसभा में भाजपा की नेता और अब विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ये भाषण अगस्त 2013 में दिया था और वो रुपये का भाव डॉलर के मुक़ाबले लगातार गिरने और 68 के पार पहुँचने पर वित्त मंत्री पी चिदंबरम के स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं थी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से जवाब की मांग कर रहीं थीं.

अगस्त २०१३, जगह- अहमदाबाद, नेता- नरेंद्र मोदी

 

“आज देखिए, रुपये की कीमत जिस तेज़ी से गिर रही है और कभी-कभी तो लगता है कि दिल्ली सरकार और रुपये के बीच में कंपीटीशन चल रहा है, किसकी आबरू तेज़ी से गिरेगी. देश जब आज़ाद हुआ तब एक रुपया एक डॉलर के बराबर था. जब अटलजी ने पहली बार सरकार बनाई, तब तक मामला पहुँच गया था ४२ रुपये तक, जब अटलजी ने छोड़ा तो ४४ रुपये पर पहुँच गया था, लेकिन इस सरकार में और अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के कालखंड में ये ६० रुपये पर पहुँच गया है.”

नरेंद्र मोदी का ये भाषण पाँच साल पुराना था जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे. लेकिन उसके बाद से हिंदुस्तान की सियासत में काफ़ी कुछ बदल चुका है, आर्थिक हालात में भी बहुत उठापटक हुई है, लेकिन कभी गिरते रुपये पर मनमोहन सरकार को घेरने वाले ये नेता इन दिनों रुपये में गिरावट को लेकर चुप्पी साधे हुए हैं.

जब मोदी सरकार मई २०१४ में दिल्ली में सत्तारूढ़ हुई थी तब डॉलर के मुक़ाबले रुपया ६० के स्तर के आसपास था. लेकिन इसके बाद से कमोबेश दबाव में ही है. पिछले कुछ महीनों से ये दबाव और बढ़ा है और हाल ये है कि लुढ़कते हुए १५ महीने के निचले स्तर पर पहुँच गया है. पिछले एक महीने में डॉलर के मुक़ाबले इसमें २ रुपये २९ पैसे की गिरावट आई है.

वैसे, रुपये ने अपना सबसे निचला स्तर भी मोदी सरकार के कार्यकाल में ही देखा है. नवंबर २०१६ में रुपये ने डॉलर के मुकाबले ६८.८० का निचला स्तर छुआ था.

हालांकि डॉलर सिर्फ़ रुपये पर ही भारी हो ऐसा नहीं है. इस साल मलेशियाई रिंगिट, थाई भाट समेत एशिया के कई देशों की करेंसी भी कमज़ोर हुई है.

रुपये की दिलचस्प कहानी

एक जमाना था जब अपना रुपया डॉलर को ज़बरदस्त टक्कर दिया करता था. जब भारत १९४७ में आज़ाद हुआ तो डॉलर और रुपये का दम बराबर का था. मतलब एक डॉलर बराबर एक रुपया. तब देश पर कोई कर्ज़ भी नहीं था. फिर जब १९५१ में पहली पंचवर्षीय योजना लागू हुई तो सरकार ने विदेशों से कर्ज लेना शुरू किया और फिर रुपये की साख भी लगातार कम होने लगी.

१९७५ तक आते-आते तो एक डॉलर की कीमत ८ रुपये हो गई और १९८५ में डॉलर का भाव हो गया १२ रुपये. १९९१ में नरसिम्हा राव के शासनकाल में भारत ने उदारीकरण की राह पकड़ी और रुपया भी धड़ाम गिरने लगा. और अगले १० साल में ही इसने ४७-४८ के भाव दिखा दिए.

रुपये का क्या है खेल?

रुपये और डॉलर के खेल को कुछ इस तरह समझा जा सकता है. मसलन अगर हम अमरीका के साथ कुछ कारोबार कर रहे हैं. अमरीका के पास ६७००० रुपए हैं और हमारे पास १००० डॉलर. डॉलर का भाव ६७ रुपये है तो दोनों के पास फिलहाल बराबर रकम है.

अब अगर हमें अमरीका से भारत में कोई ऐसी चीज मंगानी है, जिसका भाव हमारी करेंसी के हिसाब से ६७०० रुपये है तो हमें इसके लिए १०० डॉलर चुकाने होंगे.

अब हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में बचे ९०० डॉलर और अमरीका के पास हो गए ७३७०० रुपये. इस हिसाब से अमेरिका के विदेशी मुद्रा भंडार में भारत के जो ६७००० रुपए थे, वो तो हैं ही, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में जो १०० डॉलर थे वो भी उसके पास पहुंच गए.

इस मामले में भारत की स्थिति तभी ठीक हो सकती है अगर भारत अमरीका को १०० डॉलर का सामान बेचे….जो अभी नहीं हो रहा है. यानी हम इंपोर्ट ज़्यादा करते हैं और एक्सपोर्ट बहुत कम.

करेंसी एक्सपर्ट एस सुब्रमण्यम बताते हैं कि इस तरह की स्थितियों में भारतीय रिज़र्व बैंक अपने भंडार और विदेश से डॉलर खरीदकर बाजार में इसकी पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करता है.

रुपये की चाल कैसे तय होती है?

करेंसी एक्सपर्ट एस सुब्रमण्यम का कहना है कि रुपये की कीमत पूरी तरह इसकी डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है. इंपोर्ट और एक्सपोर्ट का भी इस पर असर पड़ता है. हर देश के पास उस विदेशी मुद्रा का भंडार होता है, जिसमें वो लेन-देन करता है. विदेशी मुद्रा भंडार के घटने और बढ़ने से ही उस देश की मुद्रा की चाल तय होती है. अमरीकी डॉलर को वैश्विक करेंसी का रूतबा हासिल है और ज़्यादातर देश इंपोर्ट का बिल डॉलर में ही चुकाते हैं.

रुपया क्यों कमज़ोर?

 

डॉलर के सामने अभी के माहौल में रुपये की नहीं टिक पाने की वजहें समय के हिसाब से बदलती रहती हैं. कभी ये आर्थिक हालात का शिकार बनता है तो कभी सियासी हालात का और कभी दोनों का ही. मौजूदा हालात में रुपये के कमज़ोर होने की कई वजहें हैं

पहली वजह है तेल के बढ़ते दाम– रुपये के लगातार कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल के बढ़ते दाम हैं. भारत कच्चे तेल के बड़े इंपोर्टर्स में एक है. कच्चे तेल के दाम साढ़े तीन साल के उच्चतम स्तर पर हैं और ७५ डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुँच गए हैं. भारत ज्यादा तेल इंपोर्ट करता है और इसका बिल भी उसे डॉलर में चुकाना पड़ता है.

विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली– विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ारों में अप्रैल में ही रिकॉर्ड १५ हज़ार करोड़ रुपये के शेयर बेचे हैं और मुनाफ़ा डॉलर में बटोरकर अपने देश ले गए.

अमरीका में बॉन्ड्स से होने वाली कमाई बढ़ी– अब अमरीकी निवेशक भारत से अपना निवेश निकालकर अपने देश ले जा रहे हैं और वहाँ बॉन्ड्स में निवेश कर रहे हैं.

रुपया गिरा तो क्या असर?

सवाल ये है कि डॉलर के मुक़ाबले रुपया इसी तरह गिरता रहा तो हमारी सेहत पर क्या असर होगा. सबसे बड़ा असर तो ये होगा कि महंगाई बढ़ सकती है. कच्चे तेल का इंपोर्ट होगा महंगा तो महंगाई भी बढ़ेगी. ढुलाई महंगी होगी तो सब्जियां और खाने-पीने की चीज़ें महंगी होंगी.

इसके अलावा डॉलर में होने वाला भुगतान भी भारी पड़ेगा. इसके अलावा विदेश घूमना महंगा होगा और विदेशों में बच्चों की पढ़ाई भी महंगी होगी.

रुपये कि कमज़ोरी से किसे फ़ायदा?

तो क्या रुपये की कमज़ोरी से भारत में किसी को फायदा भी होता है? सुब्रमण्यम इसके जवाब में कहते हैं. “जी बिल्कुल. ये तो सीधा सा नियम है, जहाँ कुछ नुकसान है तो फ़ायदा भी है. एक्सपोर्टर्स की बल्ले-बल्ले हो जाएगी….उन्हें पेमेंट मिलेगी डॉलर में और फिर वो इसे रुपये में भुनाकर फ़ायदा उठाएंगे.”

इसके अलावा जो आईटी और फार्मा कंपनियां अपना माल विदेशों में बेचती हैं उन्हें फ़ायदा मिलेगा.

वो १० देश जहां भारतीय रुपया पड़ता है भारी

जो भारतीय यात्रा का शौक रखते हैं वे विदेश यात्रा पर संशय में रहते हैं. उन्हें लगता है उनकी करंसी कमज़ोर है और खर्च नहीं जुटा पाएंगे. तो उनके लिए यह हक़ीक़त से ज़्यादा फसाना है. दुनिया के कई ऐसे ख़ूबसूरत देश हैं जहां की कंरसी भारत के रुपए के मुकाबले कमज़ोर है और वहां आसानी से घूमा जा सकता है.

वियतनाम

वियतनाम एक ख़ूबसूरत देश है. यहां भारतीय करंसी रुपए की हैसियत भी काफी अच्छी है. यहां एक रुपए की कीमत ३५३.८० वियतनामी डोंग है. वियतनाम अपने स्ट्रीट फूड के लिए जाना जाता है.

इंडोनेशिया

भारत का एक रुपया इंडोनेशिया की करंसी २०७.७४ रुपइया के बराबर है. इंडोनेशिया को द्वीपों का समूह कहा जाता है. इंडोनेशिया में आपको कई प्राचीन भारतीय देवी-देवताओं के मंदिर भी मिलेंगे. आप कुछ हज़ार रुपयों में इंडोनेशिया की यात्रा कर सकते हैं.

पराग्वे

यहां एक रुपए के बदले आपको पराग्वे की करंसी ८६.९६ ग्वारानी मिलेगा. यदि कुछ एडवेंचर करना चाहते हैं तो आप पराग्वे ज़रूर पहुंचिए.

कंबोडिया

कंबोडिया में एक रुपया के बदले आपको ६३.६३ रियाल मिलेगा. कंबोडिया अपनी हरियाली के लिए जाना जाता है. यहां पुरानी सभ्यताओं की महक महसूस कर सकते हैं.

मंगोलिया

मंगोलिया में भी भारतीय करंसी रुपया की सेहत अच्छी है. यहां आपको एक रुपए के बदले ३७.६० मंगोलियाई तुगरिक मिलेगा. खानाबदोशी क्या होती है इसे तो आप मंगोलिया में ही महसूस कर सकते हैं.

कोस्टा रिका

कोस्टा रिका मध्य अमरीकी देश है. यहां ८.८९ कोस्टारिकन कोलोन एक रुपए का काम करेगा. कोस्टा रिका अपनी जैवविविधता के लिए जाना जाता है. प्राचीन समुद्र तटों और रंगीन पानी को देखना हो तो कोस्टा रिका की तरफ रुख कर सकते हैं. जुरासिक पार्क की फ़िल्म की सूटिंग भी यहीं हुई थी.

हंगरी

हंगरी में आपको एक रुपये में वहां की करंसी फोरेटे के मुताबिक ४.४२ रुपये का सामान मिलेगा. हंगरी मध्य यूरोप का एक लैंडलॉक्ड देश है. लोगों को लगता है कि यूरोप जाना महंगा है, लेकिन आप हंगरी के बारे में सोच सकते हैं.

आइसलैंड

यहां भी भारतीय करंसी रुपया क्रोना पर भारी है. आइसलैंड में आपको एक रुपए के बदले १.७२ क्रोना मिलेगा. यह देश तड़पाने वाली सर्दियों के लिए जाना जाता है, लेकिन गर्मी में तो आप यहां जमकर इंजॉय कर सकते हैं.

श्रीलंका

 

श्रीलंका भारत के लिए कोई अनजान देश नहीं है. दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संबंध रहे हैं. यहां भी आपको एक रुपये के बदले २.३७ श्रीलंकाई रुपया मिलेगा. ख़ूबसूरत समुद्री तटों, जंगल, पहाड़ और चाय बगान को देखना है तो श्रीलंका जाइए.

पाकिस्तान

पाकिस्तान

भारत के एक रुपया के बदले आपको पाकिस्तान में १.६३ पाकिस्तानी रुपया मिलेगा. और पाकिस्तान तो पड़ोसी भी है.

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