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न्यायपालिका में भ्रष्टाचार – गरीब है तो न्याय नही

आश्चर्य नहीं कि भारतीय समाज के भ्रष्टाचार के सबसे व्यस्त और अपराधी अड्डे अदालतों के परिसर हैं। गांधीजी ने कहा था कि अदालत न हो तो हिंदुस्तान में न्याय गरीबों को मिलने लगे।

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, यह एक आम मान्यता है। जब किसी व्यक्ति के खिलाफ अदालती निर्णय आता है तो उसे लगता है कि जरूर न्यायाधीश ने विपक्षी लोगों से पैसे लिए होंगे या किसी और वजह से उसने अदालत का निर्णय अपने पक्ष में करवा लिया होगा। कहते सब हैं, पर डरते भी हैं कि ऐसा कहने पर वे अदालत की अवमानना के मामले में फंस न जाएं। उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।

अंग्रेजी काल से ही न्यायालय शोषण और भ्रष्टाचार के अड्डे बन गये थे। उसी समय यह धारणा बन गयी थी कि जो अदालत के चक्कर में पड़ा, वह बर्बाद हो जाता है। भारतीय न्यायपालिका में भ्रष्टाचार अब आम बात हो गयी है। सर्वोच्च न्यायालय के कई न्यायधीशों पर महाभियोग की कार्यवाही हो चुकी है। न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार में – घूसखोरी, भाई भतीजावाद, बेहद धीमी और बहुत लंबी न्याय प्रक्रिया, बहुत ही ज्यादा मंहगा अदालती खर्च, न्यायालयों की भारी कमी और पारदर्शिता की कमी, कर्मचारियों का भ्रष्ट आचरण आदि जैसे कारकों की प्रमुख भूमिका है।

आमतौर पर कहा जाता है कि फलां वकील के पास जाइए, वह निश्चित रूप से आपकी जमानत करवा देगा। उस “निश्चित रूप से” का एक अर्थ होता है। यही भ्रष्टाचार है। परन्तु अदालतों ने अपने आप को पूरी तरह से ऐसे आवरण में ढांप रखा है कि कभी इस पर न कोई खबर छपती है, न कोई कार्रवाई होती है। कानून ऐसा है कि आज न्यायाधीश को गिरफ्तार नहीं कर सकते। यह तो छोड़िए, आप उनके खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति रखने का मुकदमा नहीं बना सकते। कानून ऐसा है कि अगर कोई न्यायाधीश इस प्रकार की स्थितियों में पाया जाए तो उस पर होने वाली कार्रवाई को सार्वजनिक नहीं किया जाता।

वैसे विगत सात दशकों में राज्य के तीन अंगों के प्रदर्शन पर नजर डाली जाए तो न्यायपालिका को ही बेहतर माना जाएगा। अनेक अवसरों पर उसने पूरी निष्ठा और मुस्तैदी से विधायिका और कार्यपालिका द्वारा संविधान उल्लंघन को रोका है, लेकिन अदालतों में विचाराधीन मुकदमों की तीन करोड़ की संख्या का पिरामिड देशवासियों के लिए चिंता और भय उत्पन्न कर रहा है। अदालती फैसलों में पांच साल लगाना तो सामान्य-सी बात है, लेकिन बीस-तीस साल में भी निपटारा न हो पाना आम लोगों के लिए त्रासदी से कम नहीं है। न्याय का मौलिक सिद्धांत है कि विलंब का मतलब न्याय को नकारना होता है। देश की अदालतों में जब करोड़ों मामलों में न्याय नकारा जा रहा हो तो आम आदमी को न्याय सुलभ हो पाना आकाश के तारे तोड़ना जैसा होगा।

वस्तुत: अदालतों में त्वरित निर्णय न हो पाने के लिए यह कार्यप्रणाली ज्यादा दोषी है जो अंग्रेजी शासन की देन है और उसमें व्यापक परिवर्तन नहीं किया गया है। कई मामलों में तो वादी या प्रतिवादी ही प्रयास करते हैं कि फैसले की नौबत ही नहीं आ पाए। समाचार-पत्रों और टीवी के बावजूद नोटिस तामीली के लिए उनका सहारा नहीं लिया जाता और नोटिस तामील होने में वक्त जाया होता रहता है। आवश्यकता इस बात की है कि कानूनों में सुधार करके जमानत और अपीलों की चेन में कटौती की जाए और पेशियां बढ़ाने पर बंदिश लगाई जाए। हालांकि देश में भ्रष्टाचार इतना सर्वन्यायी हुआ है कि कोई भी कोना उसकी सड़ांध से बचा नहीं है, लेकिन फिर भी उच्चस्तरीय न्यायपालिका कुछ अपवाद छोड़कर निस्तवन साफ-सुथरी है। २००७ की ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की प्रतिवेदन अनुसार नीचे के स्तर की अदालतों में लगभग २६३० करोड़ रुपया बतौर रिश्वत दिया गया। अब तो पश्चिम बंगाल के न्यायमूर्ति सेन और कर्नाटक के दिनकरन जैसे मामले प्रकाश में आने से न्यायपालिका की धवल छवि पर कालिख के छींटे पड़े हैं। मुकदमों के निपटारे में विलंब का एक कारण भ्रष्टाचार भी है। उच्चत्तम न्यायालय और हाईकोर्ट के जजों को हटाने की सांविधानिक प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कार्रवाई किया जाना बहुत कठिन होता है।

उच्चत्तम न्यायालय द्वारा बच्चों के शिक्षा अधिकार, पर्यावरण की सुरक्षा, चिकित्सा, भ्रष्टाचार, राजनेताओं के अपराधीकरण, मायावती का पुतला प्रेम जैसे अनेक मामलों में दिए गए नुमाया फैसले, रिश्वतखोरी के चंद मामलों और विलंबीकरण के असंख्य मामलों की धुंध में छुप-से गए हैं। यह भारत की गर्वोन्नत न्यायपालिका की ही चमचमाती मिसाल है, जहां सुप्रीम कोर्ट और उसके मुख्य न्यायाधीश उन पर सूचना का अधिकार लागू न होने का दावा करते हैं और दिल्ली हाईकोर्ट उनकी राय से असहमत होकर पिटीशन खारिज कर देता है। यह सुप्रीम कोर्ट ही है, जिसने आंध्रप्रदेश सरकार द्वारा मुसलमानों को शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण पर रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हों, देश के विधि मंत्री हों या अन्य और लंबित मुकदमों के अंबार को देखकर चिंता में डूब जाते हैं, लेकिन किसी को हल नजर नहीं आता है। उधर, सुप्रीम कोर्ट अदालतों में जजों की कमी का रोना रोता है। उनके अनुसार उच्च न्यायालय के लिए १५०० और निचली अदालतों के लिए २३००० जजों की आवश्यकता है। अभी की स्थिति यह है कि उच्च न्यायालयों में ही २८० पद रिक्त पड़े हैं। जजों की कार्य कुशलता के संबंध में हाल में सेवानिवृत्त हुए उड़ीसा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बिलाई नाज ने कहा कि मजिस्ट्रेट कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के लिए कई जज फौजदारी मामले डील करने में असक्ष्म हैं। १९९८ के फौजदारी अपीलें बंबई उच्च न्यायालय में इसलिए विचाराधीन पड़ी हैं, क्योंकि कोई जज प्रकरण का अध्ययन करने में दिलचस्पी नहीं लेता। वैसे भी पूरी सुविधाएं दिए जाने के बावजूद न्यायपालिका में सार्वजनिक अवकाश भी सर्वाधिक होते हैं। पदों की कमी और रिक्त पदों को भरे जाने में विलंब ऎसी समस्याएं हैं, जिनका निराकरण जल्दी हो। हकीकत तो यह है कि न्यायपालिका की शिथिलता और अकुशलता से तो अपराध और आतंकवाद तक को बढ़ावा मिलता है।

काटजू ने एक ब्लॉग लिखकर ५० फीसदी भारतीय जजों को भ्रष्ट करार दिया है। उन्होंने कहा है कि भारतीय न्याय प्रणाली में बड़ी खामी है जिसे ठीक किया जाना बहुत जरूरी है।काटजू ने लिखा है कि जब उन्होंने 1971 में इलाहाबाद हाई कोर्ट से अपना कैरियर शुरु किया उस समय भारत की किसी भी कोर्ट में संभवत: भ्रष्टाचार नहीं था। लेकिन बाद में हाई कोर्ट में धीरे-धीरे भ्रष्टाचार बढ़ता गया। उन्होंने कहा कि १९९४ में जस्टिस वेंकटचेलैया जोकि मुख्य न्यायाधीश के समय में बड़ी संख्या में न्यायाधीशों का भ्रष्टाचार के चलते तबादले किये गये थे।वहीं २००१ में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस भरूच ने कहा था कि 20 फीसदी हाई कोर्ट के जज भ्रष्ट हो सकते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि मौजूदा समय में ५० फीसदी हाई कोर्ट के जज भ्रष्ट हैं। काटजू ने कहा कि २०११ के राजा खान बनाम सेंट्रल वक्फ बोर्ड के केस में मेरी खुद की बेंच जिसमें जस्टिस ग्यान सुधा मिश्रा भी शामिल थे को कहना पड़ा था कि इलाहाबाद हाई कोर्ट में कुछ गलत हो रहा है।काटजू ने कहा कि शांति भूषण जोकि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हैं और पूर्व में कानून मंत्री भी रह चुके हैं ने खुद सुप्रीम कोर्ट में एक एफीडिविट दाखिल किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि पूर्व के १६ मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट थे।

लेकिन मेरा मानना है कि उसके बाद से इस सूची में और भी कई नाम जुड़ गये होंगे।शांति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सीके प्रसाद के खिलाफ भ्रष्टाचार के चलते एफआईआर दाखिल करने की अपील की थी। लेकिन भारत की सुप्रीम कोर्ट ने इस भ्रष्टाचार के मुद्दे को दबा दिया था।काटजू ने कहा कि जस्टिस प्रसाद के खिलाफ मामला मेरे सामने भी आया था। जिसमें उनके खिलाफ ३५ एकड़ जमीन जिसकी कीमत तकरीबन १००० करोड़ रुपए थी को खरीदने का आरोप था। यह मामला ३ जजों की बेंच के पास था जिसमें से दो जजों ने इस मामले में महज कुछ मिनटों में अपनी मनमानी करते हुए जस्टिस प्रसाद के समर्थन में फैसला दिया था।वहीं इस मामले में दुष्यंत दवे ने सुप्रीम कोर्ट के बार काउंसिल एसोसिएशन में अपने जस्टिस प्रसाद के खिलाफ कई सबूत पेश किये थे। दवे ने अपने पत्र में लिखा था कि जस्टिस प्रसाद के द्वारा बनी बेंच जमीन के मामले की इतनी जल्दी सुनवाई करने के लिए क्यों आतुर थी। उन्होंने लिखा था कि अप्राकृतिक जल्दबाजी कई सवाल उठाती है। उन्होंने साथ ही अपने पत्र में लिखा था कि इस मामले को बिना बहस के ही पूरा कर लिया गया था।काटजू ने कहा कि मेरे अनुसार प्रथम दृष्टया यह भ्रष्टाचार का मामला था और जस्टिस प्रसाद के खिलाफ एफआईआर होनी चाहिए थी। ऐसे में शांति भूषण की इस मामले में एफआईआर दर्ज करने की अपील बिल्कुल जायज थी। वहीं जब मैंने तीन जजों के भ्रष्टाचार की बात कही थी तो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधी जस्टिस लोढ़ा ने कहा था कि कुछ लोग भारत की न्याय प्रक्रिया को बदनाम करना चाहते हैं। ऐसे में मेरा सवाल है कि क्या भ्रष्टाचार को लोगों के सामने नहीं लाना चाहिए।हाल ही मे जबलपुर मध्य प्रदेश के जज साहिब श्री आर श्रीनिवास जी ने जुडिशरी में फैले भ्र्ष्टाचार और भ्रष्ट जजो का खुलासा किया । सलाम ऐसे जज साहिब को । अपनी ईमानदारी के लिए आज ये सस्पेंड चल रहे हैं

आजादी के बाद देश में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के ४ जजों ने हाल ही मे  प्रेस कॉन्फ्रेंस कर हलचल मचा दी।सुप्रीम कोर्ट के ४ वरिष्ठ जजों जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस मदन लोकुर, जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस रंजन गोगोई ने मीडिया से मुखातिब होकर प्रशासनिक अनियमितताओं के आरोप लगाए।

सलमान खान के लिए एक जज कहता है कि सलमान ने फुटपाथ पर सोए लोगों को ठोका ,पांच साल की कैद , दूसरा जज कहता है नहीं ठोका ,बाइज्ज़त बरी । सलमान खन का छूट जाना, लालू का जेल जाना पर जगन्नाथ मिश्रा का छूट जाना एह हिन्दुस्तान के इतिहास की न्याय की सबसे बड़ी हत्या है…!!इनके हाथ मे सब ठीक करने की ताकत है…. पर भ्रष्ट वकीलों की भ्रष्ट दलीलों मे फंसकर गलत फैसले देते हैं… जिनसे दूसरों को भी गलत काम करने की प्रेरणा मिलती है……न्यायालय ने सलमान को बरी कर दिया पर कुछ प्रश्न अब भी जिन्दा और वो न्याय की गुहार लगा रहे है कि जब सलमान ने नरुल्ला को नहीं मारा तो नरुल्ला को किसने मारा? अपराध तो हुआ पर अपराधी कौन है? कमाल खान को गवाही के लिए क्यूँ नहीं बुलाया गया? क्या कोर्ट भी गरीब अमीर का अंतर करती है? अब गरीब आदमी न्याय के लिए कहाँ जायेगा?

जज साहेब कह रहे हैं कि न्यायपालिका खतरे में है। वे हाकिम हैं, हुजूर हैं, माई-बाप हैं। कह रहे हैं तो सचमुच न्यायपालिका संकट में ही होगी। किसी मे इतनी सामर्थ्य कहाँ जो उनकी बात को काट सके।  बस एक बात समझ में नहीं आती, कि यह लोकतंत्र तब खतरे में क्यों नहीं आया था जब निर्भया का अति-क्रूर हत्यारा अफ़रोज़ मुस्कुरा कर कचहरी से निकल रहा था। न्यायपालिका क्या तब संकट में नहीं आयी थी जब सिक्ख दंगो के सारे आरोपी मुस्कुराते हुए बरी हो गए थे? यह न्यायपालिका तब संकट में क्यों नहीं आयी जब टू-जी घोटाले के सभी आरोपी साक्ष्य के अभाव में छूट कर जश्न मना रहे थे? संसद में सरेआम नोट उड़ाने वाले लोगों को जब यह न्यायपालिका डांट तक नहीं पाई, तब क्या उसके अस्तित्व पर संकट नहीं था? यह न्यायपालिका तब संकट में क्यों नहीं आयी जब उसकी नाक के नीचे देश का एक प्रतिष्टित नेता जज बनाने के नाम पर किसी महिला शोषण करता पकड़ा गया? जिस न्यायपालिका में इस तरह जज बनते हों, उसके लिए क्या किसी दूसरे संकट की आवश्यकता है?

तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख. यह अब फिल्म का डायलॉग कम और हमारी अदालतों की सच्चाई ज्यादा बन गया है. जहां जजों के पास मुकदमा सुनने के लिए महज दो से पांच मिनट ही हों, वहां न्याय की क्या उम्मीद की जाए .भारत में न्यायपालिका साल दर साल मुकदमों के बढ़ते बोझ तले दब रही है. औसतन हर जज के पास लंबित एक हजार से अधिक मुकदमों को निपटाने की जल्दबाजी ने जजों द्वारा की जाने वाली सुनवाई का समय मिनटों में सीमित कर दिया है. लंबित मुकदमों के बोझ तले दबती अदालतों में सुनवाई का समय कम होना न्याय के मूल मकसद पर कुठाराघात है । सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में इंसाफ के तौरतरीकों पर हाल ही में किए गए अध्ययन के चौंकाने वाले आंकड़ों ने लगातार भयावह होती स्थिति की तस्वीर पेश की है. मसलन हर जज मुकदमे की सुनवाई में पांच मिनट देता है. कुछ हाईकोर्ट में तो यह अवधि ढाई मिनट तक सीमित हो गई है. जबकि प्रत्येक मुकदमे में सुनवाई की औसत अधिकतम समयसीमा १५ मिनट ही है. ऐसे में यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं होगा कि जटि‍लतम कानूनी प्रक्रियाओं के बीच हर तारीख पर २ से १५ मिनट की सुनवाई इंसाफ की आखिरी मंजिल को फरियादी से कितना दूर कर देती है. जजों का पूरा ध्यान एक दिन में अधिक से अधिक मुकदमे सुनने पर है. जिससे उसके खाते में ज्यादा से ज्यादा मुकदमों की सुनवाई करने का रिकॉर्ड दर्ज हो सके. कहना गलत नहीं होगा कि इंसाफ के मंदिरों में महज फाइलें निपटाने के बदस्तूर जारी सिलसिले से फरियादी को सिर्फ तारीख ही मयस्सर हो पाती है

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लगातार बढ़ते मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए सरकार और विधि‍ आयोग के दबाव ने भी जजों पर सुनवाई का समय कम करने का दबाव बनाने में अहम भूमिका निभाई है. हालांकि कुछ कानूनविदों का मानना है कि बीते कुछ सालों में लंबी सुनवाई और जिरह की परंपरा को सीमित कर सिर्फ न्यायिक जांच प्रक्रिया को पूरा करने की परिपाटी विकसित करने के कारण सुनवाई का समय कम हो रहा है.

वहीं इसके जवाब में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रमोद कुमार यादव का कहना है कि अगर इस दलील को मान भी लिया जाए तो फिर मुकदमों के निपटारे की दर में इजाफा क्यों नहीं हो रहा है. उनका कहना है कि इस परिपाटी का परिणाम फरियादियों को इंसाफ नहीं सिर्फ तारीख पर तारीख मिलना है. यही वजह है कि देश भर के हाईकोर्ट में लंबित मुकदमों की संख्या दो करोड़ को पार कर गई है. साफ है कि उच्च अदालतों में मुकदमों का बोझ कम होने के बजाय बढ़ रहा है.

मुकदमों की संख्या और इंसाफ से फरियादी की दूरी में लगातार इजाफा होना न्यायपालिका के लिए नासूर नहीं बीमारी बन गया है. हालांकि जानकारों का मानना है कि यह बीमारी अभी लाइलाज नहीं है. आंकडों की बानगी देखिए कि भारत में ७३ हजार लोगों पर एक जज है. जबकि अमेरिका में यह अनुपात सात गुना कम है. इस तरह उच्च न्यायपालिका के प्रत्येक जज पर औसतन १३०० मुकदमे लंबित हैं. मतलब साफ है कि न्याय की आस में अदालतों का रुख करने वालों की संख्या के अनुपात में जजों की संख्या नाकाफी है.

दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एपी शाह का कहना है कि विधि आयोग की तमाम सिफारिशों में सरकार से जजों की संख्या बढ़ाने को कहा गया है. लेकिन निचली अदालतों की बात तो जाने दीजिये सुप्रीम कोर्ट और सभी हाईकोर्ट में जजों के खाली पद तक नहीं भरे जा रहे हैं. नए पदों के सृजनकी बात तो अभी दूर की कौड़ी है

लातिन अमरीकी कानून की एक सूक्ति का फलसफा है कि न्याय मिलने में देरी, न्याय देने से इंकार करने के समान है. इंसाफ मिलने में पीढ़ियों का फासला भारतीय न्यायपालिका का स्थाईभाव बन गया है. यही कुरीति विधि के अपने उद्देश्य से पराजित होने की अहम वजह बन गई है. सरकारों से ऐसे में क्या उम्मीद की जाए जबकि अब तक उच्च अदालतों के जजों की नियुक्त‍ि पर ही विधायिका और कार्यपालिका का न्यायपालिका से टकराव बरकरार हो. तब फिर निचली अदालतों की लचर हालत पर सोचने की फुर्सत ही किसे है.

इतिहास पर निगाह डालें तो न्यायपालिका में राजनीति की खरोंचे काफी कुछ बयां करती दिखती हैं। वरिष्ठों की अनदेखी कर कनिष्ठों को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया जाना इस देश में एक बार नहीं दो-दो बार हुआ और विरोध में सुप्रीम कोर्ट के जजों ने इस्तीफे दिये .जस्टिस दीपक मिश्रा के मामले ने जस्टिस जेसी शाह के मामले की याद दिला दी है। १९७० में लोकसभा के १९९ सांसदों ने जस्टिस शाह को पद से हटाने के लिए लोकसभा अध्यक्ष जीसी ढिल्लन को महाभियोग नोटिस दिया था। जस्टिस शाह के खिलाफ पद से हटाने की मुहिम की शुरुआत एक पूर्व सरकारी अधिकारी ओपी गुप्ता के अभियान से हुई थी । गुप्ता ने शाह पर बेईमान होने का आरोप लगाया था। बात ये भी चली थी कि शाह ने किसी मामले की सुनवाई में गुप्ता पर टिप्पणियां की थीं। इसके बाद सोशलिस्ट पार्टी के नेताओ ने इसे मुद्दा बनाया और महाभियोग नोटिस दिया। उस केस में तत्कालीन सीजेआई ने लोकसभा अध्यक्ष को समझाया था कि ये मामला फर्जी है जिसके बाद उन्होंने १५ मई १९७० को जस्टिस शाह के खिलाफ महाभियोग नोटिस अस्वीकार कर दिया था। बाद में जस्टिस शाह भारत के मुख्य न्यायाधीश भी बने । इसके बाद १९७३ में तत्कालीन केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के तीन वरिष्ठ जजों की अनदेखी कर जब जूनियर जज एएन रे को मुख्य न्यायाधीश बनाया तो विरोध में तीनों वरिष्ठ जजों जेएम सेलेट, केएस हेगड़े और एएन ग्रोवर ने इस्तीफा दे दिया था। दूसरी घटना १९७७ की है जब एडीएम जबलपुर केस में असहमति का फैसला देने वाले जस्टिस एचआर खन्ना की वरिष्ठता की अनदेखी कर जूनियर जज एचएम बेग को मुख्य न्यायाधीश बनाया गया तो खन्ना ने विरोध में इस्तीफा दे दिया था । सुप्रीम कोर्ट के बहुमत के फैसले ने देश के नौ उच्च न्यायालयों के फैसलों को पलट दिया था। उन उच्च न्यायालयों ने अपने फैसले मे कहा था कि बंदी व्यक्ति को कोर्ट में बंदीप्रत्क्षीकरण याचिका दाखिल करने का अधिकार है। इस घटना के बाद हाईकोर्ट के फैसला देने वाले जजों के बड़े पैमाने पर तबादले हुए। ये घटनाएं न्यायपालिका में राजनैतिक हस्तक्षेप की बानगी हैं। खंगालने पर कुछ और भी मिल सकता है, लेकिन नसीहत के लिए इशारा काफी है।

कोलकाता की अलीपुर जेल में १४ अगस्त २००४ को जल्लाद नाटा मलिक ने नाबालिग के साथ बलात्कार और हत्या के लिए फांसी की सजा पाए ३९ वर्षीय धनञ्जय चटर्जी के पैरों के नीचे से जब तख्ता हटाया तो उसने एक हंगामेदार बहस के दरवाजे खोल दिए थे। सूली पर चढ़ाये गए भारत के इस ५५ वें शख्स के आखरी लफ्ज थे ,”मैं बेकसूर हूँ”। जेल में भी वह १४ साल तक लगातार यही कहता रहा था और यह भी कि उसे इंसाफ इसलिए नहीं मिला क्योंकि वह गरीब है और सुप्रीम कोर्ट तक अपना मुकदमा नहीं लड़ सकता। तक़रीबन १४ साल बाद भी कई लोग मानते है कि वह मामला वाकई अनिर्णायक परिस्थितिजन्य सबूतों और ढुलमुल गवाहों पर टिका था , जिसमे न तो टिश्यू कल्चर की रिपोर्ट थी और न ही बलात्कार की पुष्टि हुई थी ; और पीड़िता भी १८ साल से बड़ी थी न कि नाबालिग ।वास्तव में इस बात से नकारा नहीं जा सकता कि पैसे और रुतबे के बल पर सजायाफ्ता मुजरिम या अपराधी अपील के माध्याम से न्यायालय दर न्यायालय जाकर सजा से बरी हो जाता है और ऐसे अनगिनत मामले है जबकि गरीब बेचारा तो निचली अदालत के फैसले को चुनौती ही नहीं दे पाता ; कहीँ न कहीँ दोनों ही सूरत में न्याय की हार होती है। यह विषमता कैसे दूर होगी ?

 

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  1. I am fighting against a fabricated charge against me by State bank of India the matter is pending since 2007 in jharkhand high court.the matter is always delisted from court list .justice is not accepting mentioning slip.there is no scope for justice in the hounrable court.

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