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कैलाश मानसरोवर – विभिन्न मान्यताएँ मय यात्रा के नजारे।

कैलाश पर्वत और मानसरोवर को धरती का केंद्र माना जाता है। यह हिमालय के केंद्र में हैं। मानसरोवर वह पवित्र जगह है , जिसे शिव का धाम माना जाता है। मानसरोवर के पास स्थित कैलाश पर्वत पर भगवन शिव साक्षात् विराजमान है । यह हिंदुओं के लिए प्रमुख तीर्थ है। संस्कृत शब्द मानसरोवर , मानस तथा सरोवर को मिल कर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है – मन का सरोवर। कैलाश मानसरोवर का नाम सुनते ही हर किसी का मन वहां जाने को बेताब हो जाता है। मानसरोवर के पास एक सुन्दर सरोवर रकसताल है। इन दो सरोवरों के उत्तर में कैलाश पर्वत है । इसके दक्षिण में गुरला पर्वतमाला और गुरला शिखर है। मानसरोवर के कारण कुमाऊं की धरती पुराणों में उत्तराखंड के नाम से जानी जाती है। कैलाश पर्वत समुद्र सतह से २२०६८ फुट ऊंचा है तथा हिमालय से उत्तरी क्षेत्र में तिब्बत में स्थित है। चूँकि तिब्बत चीन के अधीन है अतः कैलाश चीन में आता है। मानसरोवर झील से घिरा होना कैलाश पर्वत की धार्मिक महत्ता को और अधिक बढाता है। प्राचीन काल से विभिन्न धर्मों के लिए इस स्थान का विशेष महत्व है। इस स्थान से जुड़े विभिन्न मत और लोककथाएँ केवल एक ही सत्य को प्रदर्शित करती है , जो है ईश्वर ही सत्य है, सत्य ही शिव है।


तिब्बतियों की मान्यता है कि वहां के एक संत कवि ने वर्षों गुफा में रहकर तपस्या की थी, कैलाश में जो नौमंजिला स्वस्तिक है वह डेमचौक और दोरजे फांगमो का निवास है और बौद्ध धर्मावलंबी इसे भगवान बुद्ध के अलौकिक रूप में पूजते हैं।

डेमचौक


जैनियों की मॉन्यता है क़ि आदिनाथ ऋषभ देव् का यह निर्वाण स्थल ‘अष्टपद’ है। कहते है ऋषभदेव ने आठ पग में कैलाश की यात्रा की थी। हिन्दू धर्म की मॉन्यता है कि कैलाश पर्वत मेरु पर्वत है जो ब्रह्माण्ड की धूरी है और यह भगवन शंकर का प्रमुख निवास स्थान है। यहां देवी सती के शरीर का दायां हाथ गिरा था , जिस कारण यहॉ एक पाषाण शिला को उसका रूप में मानकर पूजा जाता है, यही शक्तिपीठ है।

‘अष्टपद’


मॉन्यता यह भी है कि गुरु नानक ने यहां कुछ दिन रूककर ध्यान किया था , इसलिए सिखों के लिए भी यह पवित्र स्थान है।

कैलाश क्षेत्र को स्वंभू कहा गया है। इस अलौकिक जगह पर प्रकाश तरंगों और ध्वनि तरंगों का अद्भुत समागम होता है, जो ‘ऊँ’ की प्रतिध्वनि करता है। इस पावन स्थल को भारतीय दर्शन के ह्रदय की उपमा दी जाती है , जिसमे भारतीय सभ्यता की झलक प्रतिबिंबित होती है। कैलाश पर्वत की तलछटी में कल्पव्रक्ष लगा हुआ है । कैलाश पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूर्व भाग को क्रिस्टल, पश्चिम को रूबी और उत्तर को स्वर्ण रूप में माना जाता है।

‘ऊँ’


एक अन्य पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह जगह कुबेर की नगरी है । यहीँ से महाविष्णु के करकमलों से निकलकर गंगा कैलाश की चोटी पर गिरती है, जहां प्रभु शिव उन्हें अपनी जटाओं में भर धरती में निर्मल धारा के रूप में प्रवाहित करते है। कैलाश पर्वत पर शिव विराजे है, जिसके ऊपर स्वर्ग और नीचे मृत्यु लोक है, इसकी बाहरी परिधि ५२ कि मी है । मानसरोवर पहाड़ो से घिरी झील है जो पुराणों में क्षीरसागर के नाम से वर्णित है जो कैलाश से ४० क़ि मी की दूरी पर है व इसी में शेष शय्या पर विष्णु व लक्ष्मी विराजित हो पूरे संसार को संचालित कर रहे है।

ऐसा भी माना जाता है महाराजा मांधाता ने मानसरोवर झील की खोज की और कई वर्षों तक इसके किनारे तपस्या की थी, जोकि इन पर्वतों की तलहटी में स्थित है । बौद्ध धर्मावलंबियों का मानना है कि इसके केंद्र में एक वृक्ष है जिसके फलों के चिकित्सकीय गुण सभी प्रकार के शारीरिक व मानसिक रोगों का उपचार करने में सक्षम है।
कैलाश पर्वत की चार दिशाओं से चार नदियों का उदगम हुआ है ब्रह्मपुत्र, सिंधु, सतलज व करनाली। इन नदियों से ही गंगा, सरस्वती सहित चीन की अन्य नदियां भी निकली है। कैलाश के चारो दिशाओं में विभिन्न जानवरों के मुख है जिसमे से नदियों का उदगम होता है , पूर्व में अश्वमुख, पश्चिम में हाथी का, उत्तर में सिंह का और दक्षिण में मोर का मुख्य है। कैलाश मानसरोवर से जुड़े हजारों रहस्य पुराणों में भरे पड़े हैं,सभी में कैलाश खंड नाम से अलग ही अध्याय है । यहां तक पहुंच कर ध्यान करने वालों को मोक्ष की प्राप्ति होती है । भारतीय दार्शनिको और साधको का यह प्रमुख स्थल है।

यात्रा नेपाल मार्ग से

हाल के सालों में पश्चिमी नेपाल के हुमला से होते हुए कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं की तादाद बढ़ी है। बीते साल ही बारह हज़ार से अधिक पर्यटक नेपाल के रास्ते कैलाश पर्वत तक गए. साल २०१८ में अब तक छह हज़ार पर्यटक इस रास्ते से जा चुके हैं। ये ऊंचे पहाड़ी इलाक़े में है और यहां तक ट्रैक करके जाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। नेपाल से जाने वाला रास्ता कैलाश तक पहुंचने के तीन रास्तों में से एक है। इस यात्रा पर भारतीय तीर्थयात्री जहां डेढ़ लाख रुपए तक ख़र्च करते हैं वहीं विदेशी सैलानियों का ख़र्ज ३५०० डॉलर तक आता है। यहां आने का सबसे अनुकूल समय अप्रैल से जून के बीच है, हालांकि अक्टूबर के अंत तक यहां पर्यटक और तीर्थयात्री आते रहते हैं। अधिकतर पर्यटक भारतीय तीर्थयात्री होते हैं. वो पहले कांठमांडू से नेपालगंज पहुंचते हैं और फिर आगे बढ़ते हैं।

नेपालगंज से ४५ मिनट की उड़ान से वो हुमला के सिमीकोट पहुंचते हैं जहां से आगे का रास्ता हेलिकॉप्टर से तय किया जाता है। सिमीकोट से उन्हें सीमावर्ती शहर हिलसा ले जाया जाता है जहां से वाहन के ज़रिए तिब्बत के तकलाकोट ले जाया जाता है।  कैलाश मानसरोवर की असली यात्रा यहीं से शुरू होती है।

एक सप्ताह की यादगार यात्रा के बाद वो तिब्बत के ताकलाकोट पहुंचते हैं और वापसी का सफ़र शुरू करते हैं।

काठमांडू से लहासा के लिए ‘चाइना एयर’ वायुसेवा उपलब्ध है, जहां से तिब्बत के विभिन्न कस्बों- शिंगाटे, ग्यांतसे, लहात्से, प्रयाग पहुंचकर भी मानसरोवर जा सकते हैं। पहला बड़ा पड़ाव तिब्बत का ल्हासा शहर है। अगर आपके पास भारत से बाहर का पासपोर्ट है, तो आपको इस जगह जाने की अनुमति है। यह कई शताब्दियों से दलाई लामाओं का पवित्र स्थान रहा है।यहाँ आप पोटाला पैलेस के दर्शन कर सकते है। महल की सीढिय़ां बहुत संकरी हैं, हर जगह ढेर सारी कलाकृतियां हैं। निश्चित रूप से यह पिकनिक स्पॉट नहीं है, मगर पूर्व भिक्षुओं और उनकी जीवन शैली का इतिहास जानने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। 

पोटाला पैलेस आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतीक है, जहां संस्कृत श्लोकों का व्यापक भंडार है। कैलाश के सारे रास्ते में भव्य पहाड़, नदियां, झील और झरने हैं। आप यह सुनिश्चित करें कि आप बस में सो न जाएं, वरना आप इन्हें देखने से चूक जाएंगे। यह शांत और निर्जन झील कई तरह से आपको भ्रम में डाल सकती है। बहुत से लोग ब्रह्मांडीय ऊर्जा को महसूस करते हैं और अगर आप भाग्यशाली हैं, तो आप भोर की रश्मियां देख सकते हैं। यह जगह आपको कैलाश के लिए तैयार करती है। यहां आकर लोग बात कम करने लगते हैं और प्रकृति को महसूस करना चाहते हैं। इस जगह बहुत गहरी और तरह-तरह की निजी भावनाएं उभरती हैं। आपको एहसास होता है कि आप ईमेल या फेसबुक नहीं चेक कर रहे मगर फिर भी दिन आराम से गुजरता है। आप मानसरोवर झील में पवित्र स्नान कर सकते हैं। दक्षिणी सिरे से पश्चिम तक की तेरह किलोमीटर की पैदल चढ़ाई कइयों के लिए व्यक्तिगत तौर पर एक चुनौती है, मगर आपको इसका फ ल भी मिलता है! अगर आप हवा में मौजूद हल्के ऑक्सीजन का लाभ उठा सकते हैं, तो इस यात्रा में बहुत खूबसूरत झरने और ढेर सारी प्राकृतिक सुंदरता है। 

उत्तराखंड से शुरु होने वाली यात्रा : 

भगवान शिव के इस पवित्र धाम की यह रोमांचकारी यात्रा भारत और चीन के विदेश मंत्रालयों द्वारा आयोजित की जाती है। इधर इस सीमा का संचालन भारतीय सीमा तक कुमाऊं मण्डल विकास निगम द्वारा की जाती है, जबकि तिब्बती क्षेत्र में चीन की पर्यटक एजेंसी इस यात्रा की व्यवस्था करती हैं। अंतरराष्‍ट्रीय नेपाल-तिब्बत-चीन से लगे उत्तराखंड के सीमावर्ती पिथौरागढ़ के धारचूला से कैलाश मानसरोवर की तरफ जाने वाले दुर्गम व ७५ किलोमीटर पैदल मार्ग के अत्यधिक खतरनाक होने के कारण यह यात्रा बहुत कठिन होती है। लगभग एक माह चलने वाली पवित्रम यात्रा में काफी दुरुह मार्ग भी आते हैं अक्टूबर से अप्रैल तक इस क्षेत्र के सरोवर व पर्वतमालाएं दोनों ही हिमाच्छादित रहते हैं। सरोवरों का पानी जमकर ठोस रूप धारण किए रहता है। जून से इस क्षेत्र के तामपान में थोड़ी वृद्धि शुरू होती है।

अब हिमाचल-सिक्कीम से : 

चीन से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए हिमाचल प्रदेश के शिपकी ला पास से होकर गुजरने वाले मार्ग को मानसरोवर यात्रा के लिए खोले जाने के लिए चर्चा हुई है। हिमाचल के किन्नौर से गुजरने वाला यह मार्ग मौजूदा उत्तराखंड के यात्रा मार्ग के मुकाबले कम दूरी का है। आप सीधे सिक्किम पहुंचकर भी यात्रा शुरू कर सकते हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए नाथुला दर्रा भारत और तिब्बत के बीच एक बड़ा आवा-जाही का गलियारा था जिसे १९६२ के युद्ध के बाद बंद कर दिया गया।नाथुला के रास्ते से कई सुविधाएं हैं। इससे मोटर से कैलाश मानसरोवर तक यात्रा की जा सकती है, इससे विशेषकर बूढे तीर्थयात्रियों को लाभ होगा। तीर्थयात्रा कम समय में पूरी की जा सकेगी और भारत से काफी संख्या में तीर्थयात्री वहां जा सकेंगे। कई मायनों में यह नया रास्ता बरसात के मौसम में भी सुरक्षित होगा।

कैलाश और मानसरोवर झील ज्ञान की व्यापक और अंतहीन संभावना पेश करते हैं। हर व्यक्ति दिव्य मौजूदगी को महसूस कर सकता है और अपने मन में उस पवित्र वातावरण को आत्मसात कर सकता है।

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