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world biofuel day: पीएम मोदी ने सुनाई किसान और चायवाले के आधुनिक आइडिया की कहानी।

पिछले एक दो साल से कई लोगो ने ये BioDiesel नाम सुना होगा। कुछ लोगो ने खोजबीन भी की होगी के आखिर ये क्या बला है। चाहिए आज यही जानते है की Biodiesel क्या होगा है व ये किन किन गाड़ियों में काम में लिया जा सकता है।

BioDiesel क्या है?

बायो डीजल जैसे की अपने नाम से ही कहता है की वह एक डीजल ही है लेकिन Bio यानी जैविक चीज़ से बना हुआ। आम पेट्रोलियम डीजल जो हर पंप पे मिलता है वो तेल के कुओं से निकले गया क्रूड आयल से बनता है। बायो डीजल कुछ पौधों (जट्रोफा खासतौर) से बनता है। पौधों के उपयोगी हिस्सों को जब Compress किया जाता है तो वे भी एक क्रूड आयल में बदल जाते है। उस क्रूड आयल से भी कई तरह के एनर्जी देने वाले पदार्थ बनाये जाते है जिसमे बायो-डीजल एक है।

क्या BioDiesel किसी भी गाडी में डाल सकते है?

जी हाँ, बायो डीजल को हम किसी भी “Diesel” इंजन में काम में ले सकते है। फिर चाहे वो बस हो, ट्रेक्टर हो, कारखाने की मशीने हो या कोई ट्रक। Car में भी अब इसका इस्तेमाल होने लगा है। हम Biodiesel को आम डीजल के साथ mix भी कर सकते है।

भारत में कोनसी कंपनी बायोडीजल बनती है?

गाड़ियों में इस्तेमाल किया जाए ऐसा बायोडीजल अभी तक भारत में नहीं बन पा रहा है। लेकिन कुछ कम्पनिया है जो इसे बाहर से लाके भारत में बेचती है। My Eco Energy नाम की एक कंपनी Indizel ब्रांड के साथ अपना बायो-डीजल बेचने की शुरुआत करने जा रही है।

क्या फायदे है बायोडीजल के?

बायो डीजल कई फायदे देता है। आइये उन्हें एक एक करके जानते है।

  1. कम प्रदुषण करता है।
  2. Cetane की मात्रा ज्यादा होने की कारण इंजन में combustion सही होता है और अच्छा Pickup मिलता है।
  3. पेट्रोलियम आधारित डीजल के मुकाबले ये ज्यादा चिकना होता है, इसके कारण इंजन कम कंपन करता है।
  4. आम डीजल से इसकी रेट कम होगी।
  5. ज्यादा माइलेज/एवरेज देता है।

Biodiesel के पंप कहा है?

फिलहाल Indizel के पंप राजस्थान व महाराष्ट्र में कई जगह पे है लेकिन अभी आम जनता के लिए पूरी तरह चालु नहीं है। राजस्थान में एक Washwell नाम के ब्रांड का बायोडीजल मिलता है लेकिन GaadiFy को उसे टेस्ट करने का मौका नहीं मिला है तो कह पाना मुश्किल है की ये गाड़ियों के लिए अच्छा है की नहीं।

वर्ल्ड बायोफ्यूल डे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार कई प्रेरणादायक बातें की। उन्होंने एक किसान और एक चायवाले की आधुनिक तकनीक को जनता से साझा किया। पीएम मोदी ने अपने मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरात के एक अनुभव को बताया। उन्होंने कहा कि एक दिन जब वो अपने काफिले के साथ गुजर रहे थे तो उन्हें एक किसान की आधुनिक तकनीक देख खुशी हुई। पहले तो तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी उसे देखकर दुविधा में पड़ गए थे लेकिन थोड़ी देर बाद जब उससे बात की तो उन्हें किसान का सामर्थ्य पता चला।

पीएम मोदी ने कहा कि एक दिन उनका काफिला गुजर रहा था। आगे एक स्कूटरवाला ट्रैक्टर का बड़ा ट्यूब लेकर जा रहा था। पीछे चल रही गाड़ियों के ड्राइवर डर रहे थे कि कहीं टकरा न जाएं। प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं भी हैरान था कि यह ऐसे कैसे ले जा रहा है। उन्होंने कहा, ‘कोई भी समझदार व्यक्ति ट्यूब खाली कर देता और आगे जाकर हवा भर लेता। मैंने उसे रोकवाया। स्कूटरवाले से पूछा कि भाई क्या कर रहे हो। गिर जाओगे, चोट लग जाएगी। उसने बताया कि वह अपने खेत जा रहा है।’ 

प्रधानमंत्री ने कहा, ‘मैंने उससे पूछा कि खेत में ये भरा हुआ ट्यूब क्यों ले जा रहे हो? उसने बताया कि मेरे घर में किचन का जो कूड़ा-कचड़ा निकलता है वह, और मेरे पास दो पशु हैं, उसके गोबर का इस्तेमाल वह गैस के प्लांट में करता है। उसने बताया कि वह उस गैस को ट्यूब में भरता है और उसे लेकर खेत में जाता है। खेत में उसी से वह पानी का पंप चलाता था।’ मोदी ने आगे कहा कि आप कल्पना कीजिए कि हमारे देश का किसान कितना सामर्थ्यवान है। 

चायवाले का भी सुनाया किस्सा

पीएम ने कहा, ‘मैंने अखबार में पढ़ा था कि एक छोटे से नगर में नाले के पास कोई चाय बेचता था।’ मोदी ने कहा कि जब चाय बनाने की बात आती है तो मेरा ध्यान थोड़ा जल्दी जाता है। इस पर कार्यक्रम में मौजूद सभी लोग तालियां बजाते हुए हंस पड़े। उस चायवाले को पता चला कि गंदे नाले से गैस भी निकलती है। इससे दुर्गंध आती थी तो उसने एक बर्तन को उल्टा करके छेद करके पाइप डाल दी और जो गटर से गैस निकलती थी उसे पाइप के जरिए चाय के ठेले से जोड़ दिया। इसके बाद वह इसी गैस से चाय बनाने लगा। 

इस दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि बायोफ्यूल सिर्फ विज्ञान नहीं है बल्कि वह मंत्र है जो 21वीं सदी के भारत को नई ऊर्जा देने वाला है। बायोफ्यूल यानी फसलों से निकला ईंधन या कूड़े-कचरे से निकला ईंधन। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘ये गांव से लेकर शहर तक के जीवन को बदलने वाला है। आम के आम, गुठली के दाम की जो पुरानी कहावत है, उसका ये आधुनिक रूप है।’ 

इथेनॉल से बचे ४ हजार करोड़
 
उन्होंने कहा कि गन्ने से इथेनॉल बनाने की योजना पर अटल जी की सरकार के दौरान काम शुरू हुआ था लेकिन बीते एक दशक में इस पर गंभीरता से प्रयास नहीं हुए। जब २०१४ में केंद्र में NDA की सरकार बनी तो रोडमैप तैयार किया गया और इथेनॉल को मिलाने का प्रोग्राम शुरू किया गया। उन्होंने कहा कि इथेनॉल ने न सिर्फ किसानों को लाभ पहुंचाया है, बल्कि देश का पैसा भी बचाया है। इथेनॉल को पेट्रोल के साथ मिक्स करने से पिछले वर्ष देश को लगभग ४ हजार करोड़ रुपये के बराबर की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है। पीएम ने कहा कि लक्ष्य यह है कि अगले चार वर्ष में ये बचत करीब १२ हजार करोड़ रुपये तक पहुंचे। 

उन्होंने कहा कि बायोफ्यूल का इस्तेमाल किसानों की आमदनी बढ़ाएगा, रोजगार के नए अवसर पैदा करेगा, देश का धन बचाएगा और पर्यावरण के लिए भी वरदान साबित होगा। पीएम ने कहा कि देश के लिए यह हमारे उस व्यापक विजन का हिस्सा है, जहां स्वच्छता, स्वास्थ्य और गांव-गरीब-किसान के समृद्धि का रास्ता और मजबूत होगा। 

प्रधानमंत्री में बताया कि बायोमास को बायोफ्यूल में बदलने के लिए सरकार बड़े स्तर पर निवेश कर रही है। देशभर में १२ आधुनिक रिफाइनरी बनाने की योजना है। रिफाइनरी के संचालन से लेकर सप्लाई चेन तक, लगभग डेढ़ लाख नौजवानों को रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होंगे। उन्होंने कहा कि आज गोबरधन, वनधन और जनधन से गरीबों, किसानों, आदिवासियों के जीवन में व्यापक बदलाव के प्रयास हो रहे हैं। ना सिर्फ फसल बल्कि पशु के गोबर का, खेत के अवशेष का, कूड़े-कचरे के उचित उपयोग के लिए काम हो रहा है।

ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय विज्ञान एजेंसी ने कहा है कि उड्डयन उद्योग में का इस्तेमाल अगले बीस साल में संभव है। ऑस्ट्रेलिया एक बड़ा देश है जहां हवाई जहाज की यात्रा जरूरी हो जाती है और वहां शोधकर्ता इस बात की कोशिश कर रहे हैं कि किस तरह से सस्ते ईंधनों के विकल्प को तैयार किया जा सके।ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक बहुत जोर देकर कह रहे हैं कि उड्डयन उद्योग में अगर जैविक ईंधन का उपयोग किया जाए तो देश का ग्रीन हाउस उत्सर्जन १७ प्रतिशत तक कम किया जा सकता है और इसके सालाना उर्जा की खपत को कम से कम दो अरब डॉलर तक कम किया जा सकता है।

यूँ तो ऑस्ट्रेलिया में बायोफ्यूल का यूज़ हो रहा है, बाइक्स में हो रहा है, घरेलू इंधन के रूप में हो रहा है , बायोडीजल से फ्लीट चल रहे है, नेवी के जहाजों में भी यूज़ हो रहा है।

ग्रीन’ विकल्प : ऐसी उम्मीद है कि ये ‘ग्रीन’ विकल्प दो दशकों के भीतर व्यवसायिक स्तर पर कारगर साबित हो जाएगा‘। टिकाऊ उड्डयन ईंधन की दिशा’ नामक एक नई रिपोर्ट में साफ ईंधन तकनीक के क्षेत्र में होने वाले विकास पर विस्तृत चर्चा हुई है। इसमें बड़े उद्योग मसलन क्वांटस, बोईंग, एयर न्यूजीलैंड और रॉल्स रॉयस भी सहयोग कर रहा है।कॉमनवेल्थ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च नामक संगठन में एक टीम इस पर काम कर रही है। इस संगठन में काम कर रहे अर्थशास्त्री पॉल ग्राहम का कहना है कि इस परियोजना की तरक्की ठीक दिशा में हो रही है।पॉल कहते हैं, ‘दुनिया के दूसरे क्षेत्र में भी लोग अपनी परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया में हमारी स्थिती थोड़ी अलग है। हमारे पास बायोमॉस की कमी नहीं है और इसीलिए हम अपने हवाई जहाज जैविक ईंधन पर चला सकते हैं। कार्बन उत्सर्जन को कम करने की दिशा में ये एक अहम कदम है।’ बीबीसी संवाददाता फिल मर्सर के अनुसार कुछ जैविक ईंधनों की इस बात पर निंदा हो रही है कि वे जरूरी संसाधनों को कम कर रहे हैं। लेकिन ऑस्ट्रेलिया के मॉडल का आधार जंगल और शहर के कूड़े कचरे से ईंधन पैदा करना है। अतंरराष्ट्रीय उर्जा एजेंसी के अनुसार 2050 तक उड्डयन उद्योग की जरूरतों का तीस प्रतिशत जैविक ईंधन से पूरा होगा।

अफ्रीकन एयरवेज। पिछले साल जुलाई में उसने टेस्ट फ्लाइट के रूप में ३०० यात्रियों वाले जेट विमान को जोहानसबर्ग से केपटाउन के बीच टोबैको बायोडीजल से उड़ाया था।

तंबाकू के पौधे से बनने वाले बायोडीजल से कमर्शियल विमान चलाने की तैयारी चल रही है। इसमें सबसे आगे है साउथ अफ्रीकन एयरवेज। पिछले साल जुलाई में उसने टेस्ट फ्लाइट के रूप में 300 यात्रियों वाले जेट विमान को जोहानसबर्ग से केपटाउन के बीच 1280 किलोमीटर टोबैको बायोडीजल से उड़ाया था। अब अमेरिकी कंपनी बोइंग भी इस दिशा में उसके साथ मिलकर काम कर रही है। बड़े पैमाने पर बायोडीजल का इस्तेमाल मुमकिन हो जाए, तो यह सस्ता होगा और पर्यावरण के लिए अच्छा भी। खास तरह के पौधे से बनता है बायोफ्यूल..इस तंबाकू में निकाेटिन बहुत कम है।

बायोडीजल कई चीजों से बनाए जाते हैं। इनमें एल्गी, एग्रीकल्चरल वेस्ट और कैमेलिना तथा जेट्रोफा प्लांट प्रमुख हैं। साउथ अफ्रीका में टोबैको को प्रायोरिटी दी गई, क्योंकि यह लोकल क्रॉप है और इसकी सप्लाई आसानी से हो सकती है।
वहां तंबाकू प्लांट से फ्यूल बनाने के लिए सोलरीस प्रजाति के पौधे का प्रयोग हो रहा है। तंबाकू प्लांट होने के बावजूद इसमें निकोटिन की मात्रा बहुत कम होती है।
-साउथ अफ्रीकन एयरलाइंस ने २०१७ साल से टोबैको बायोफ्यूल का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। शुरुआत में फॉसिल फ्यूल में ही बायोडीजल का कुछ हिस्सा मिलाकर यूज किया जा रहा है। फिर धीरे-धीरे फॉसिल फ्यूल का हिस्सा कम करते हुए बायोडीजल का हिस्सा बढ़ाया जाएगा।
विमान कंपनियों को फ्यूल पर सबसे ज्यादा खर्च करना पड़ता है। यह कंपनी के कुल संचालन खर्च का एक-तिहाई होता है।
-बायोडीजल अभी महंगा है, लेकिन बड़े पैमाने पर प्रॉडक्शन होने पर इसकी लागत कम हो जाएगी। पर्यावरण के लिए भी अच्छा है। इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन का अनुमान है कि यदि बायोडीजल का प्रयोग होने लगे, तो एविएशन इंडस्ट्री का कार्बन फुटप्रिंट ८० फीसदी तक छोटा हो जाएगा। कार्बन फुट हमारे क्रियाकलापों से पर्यावरण हो होने वाले नुकसान पर आधारित होता है। जितना छोटा फुटप्रिंट, उतना कम नुकसान।
देश में पर्यावरण सुरक्षित रखने के लिए २०३० तक पैट्रो उत्पाद के आयात को १० प्रतिशत तक कम करने के लक्ष्य की भावना के अनुरूप देश में अधिक से अधिक बायोफ्यूल का उत्पादन एवं उपयोग को बढ़ावा देने के लिए काम करना होगा। राजस्थान सरकार ने २००७ में बायोफ्यूल प्राधिकरण की स्थापना की थी।राजस्थान ऎसा प्रदेश है जहां बंजर भूमि की उपलब्धता अधिक है तथा २० जिलों की जलवायु अखाद्य तैलीय पौधे जैसे रतनजोत, करंज एवं महुआ के लिए उपयुक्त है। राज्य में महात्मा गांधी की नरेगा योजना से कंवर्जन कर उपलब्ध वन भूमि विकास के साथ तैलीय पौधों का भी पौधारोपण किया जा रहा है। प्रदेश में अब तक लगभग ३ करोड़ अखाद्य तैलीय पौधों का रोपण किया जा चुका है जिन्हें न्यूनतम मूल्य का निर्धारण कर राजफैड एवं राजसंघ द्वारा १५ रुपए प्रति किलो की दर से खरीदा जा रहा है।
प्रयास हो रहे है, डर है योजनाएं सिर्फ कागजों पर ही न रह जाए या फिर अफसरशाही का शिकार होकर सिर्फ घोषणाओं तक ही न रह जाये। 

 

 

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