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इंदिरा साहनी : आरक्षण के मुत्तलिक स्थिति साल १९९२ से भिन्न है !

सामान्य वर्ग को आर्थिक आधार पर १० प्रतिशत आरक्षण देने के लिए संविधान में संशोधन का विधेयक संसद के दोनों सदनों में पारित हो गया है।इससे आरक्षण की अधिकतम ५० फ़ीसदी सीमा के बढ़कर ६० प्रतिशत हो जाने का रास्ता आसान हो गया है।१९९२ में सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता इंदिरा साहनी की याचिका पर ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए जाति-आधारित आरक्षण की अधिकतम सीमा ५० फ़ीसदी तय कर दी थी।इंदिरा साहनी को अब लगता है कि आरक्षण विधेयक का इस बार उस तरह विरोध नहीं होगा जैसा कि १९९२ में हुआ था। 

भारत में जातिगत आरक्षण के विरोध में अभियान चलाने वाले संगठन यूथ फ़ॉर इक्वलिटी ने सुप्रीम कोर्ट में आर्थिक आधार पर १० फ़ीसदी अतिरिक्त आरक्षण को चुनौती दे दी है।संगठन का कहना है , “हम आर्थिक आधार पर आरक्षण का विरोध नहीं कर रहे हैं, हम चाहते हैं कि ग़रीबों को आरक्षण मिले लेकिन ये ५०  फ़ीसदी की सीमा के अतिरिक्त नहीं होना चाहिए बल्कि इसके भीतर ही होना चाहिए। यही मांग करते हुए हमने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है जिसे स्वीकार कर लिया गया है।”

अब जरा याददाश्त पर जोर डालें और साल १९९२ के दौरान मंडल आयोग के विरोध में होने वाली रैलियों को याद करें।छात्र और अन्य युवा विरोध कर रहे थे। आत्मदाह तक करने को उतारू थे।इसी से प्रभावित होकर इंदिरा साहनी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी थी। इसी पर फ़ैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की अधिकतम सीमा ५० फ़ीसदी तय कर दी थी। अब विरोध यदि हो भी रहा है तो दबे दबे स्वरों में ! 

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कारण स्पष्ट है।अब लगभग ९०-९५ फीसदी जनता कवर हो जा रही है भले ही सवाल उठते रहेंगे आरक्षण के प्रतिशत को लेकर।और फिर कुछ तो भला होगा ही सामान्य वर्ग का ! हालाँकि जो थोड़े से लोग बाहर रह जा रहे हैं उनके बराबरी के अधिकार का हनन तो होगा ही , मेरिट वालों का भी नुकसान होगा ही ! देखा जाय तो सुप्रीम कोर्ट के लिए १९९२ की वजहें बरकरार है। उस समय भी आरक्षण ५०  फ़ीसदी की सीमा को पार कर रहा था और इसी का विरोध करने के लिए  याचिका दायर की गयी थी। अब फिर से ऐसा हो रहा है, ये बराबरी के अधिकार के ख़िलाफ़ है।

अभी पूरी तरह से पता भी नहीं है कि सरकार करने क्या जा रही है। जब स्पष्ट जानकारी होगी तभी कोई चुनौती सार्थक होगी। किसी भी तरह के तीव्र विरोध की आशंका नहीं है क्योंकि आरक्षण के बाहर रहने वालों की संख्या ही नगण्य रह गयी है।  

 

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